रुनांसे होना नहीं तुम! अंत में।

याद.. है.. 
मुझे याद.. है,
बहुत.. पहले, एक 
गुब्बारा, मै था.. छींट.. का, 
हां छींट का ही प्रिंट था, 
प्रिय मेरे ऊपर,
गुलाबी..
परिधान... पहने.. 
गोलू मटोलू, छलकता.. 
लुभाता.., कुछ ललच देता, 
किशोरी मन.. खींचता था, अपने ऊपर! 
सूत्र.. से, तरकशों.. में, बंधा.. था, 
कंधे.. पे रखी, लाठियों.. में,
पुष्प सा.. मैं लहरता था,
साथियों संग
मौज 
करता.. हवाओ संग, खेलता था

क्या!  
मस्त था, मैं..! 
उड़ रहा था, सबसे ऊपर, गगन में,
किस.. तरह, से.. तना.. था, निज गर्व.. में..
बता दूं! हीलियम भरा था, 
यार मुझमें पेट में, 
मस्तिष्क.. में।
अक्रिय है 
जो.. 
इस लिए, इस विश्व की
रति.. छोड़ कर
अभिगमन.. 
को, 
उद्धत.. हुआ था, 
त्यागकर हर प्रवंचना, इस जगत की..।

सोचता.. हूं,
बता दूं..
वाह! 
क्या.. परिवेश था, 
मेला..., लगा.. था, गांव के बाजार में, 
चुहुल.. थी, चहुंओर.. 
सुंदर, लोग थे,
कुछ 
बच्चियां थी, 
फूल सी, अधखुली आंखे लिए
अधखिला, तन मन लिए, 
किशोरी थीं, 
देखतीं थीं, ओर.. मेरी दृष्टि भर भर, 
ललचती थीं, प्राण भर! भर! 
क्या कहूं! वह.. स्थिति
देखता, मन-स्थिति! 
मैं चाहता था
साथ उसके
हो चलूं।
हाथ उसके बंध सकूं।

प्रिय मान मेरी! 
सत्य है यह, 
इस जन्म में भी, साथ तेरे और मेरे,
याद कर! हाय वो पल! 
जब, बंध गए थे, 
नेत्र.. अपने, इस तरह, ही
आस.. में, पहले.. मिलन.. की! 

फिर 
क्या हुआ..? 
मैं.. बिक गया! 
उतर कर आकाश.. से
हाथ.. उसके, चंद.. पैसों के लिए, 
मैं जिंदगी भर के लिए
प्रिय! बंध गया।
पर, 
सच कहूं, 
मैं खुश! बहुत था, 
एक.. चाह थी, पूरी... हुई थी, 
कल्पना थी मिलन की, 'पर' ले उड़ी थी।

साथ लेकर,
बालिका... वह, 
बांध अपने हाथ, मुझ.. संग, 
उड़ रही थी, 
क्या चाल थी, कमाल थी.., 
वह लड़की नहीं.., भूचाल.. थी
गुब्बारा था मैं.., सलोना.., 
छींट का
गुलाबी.., परिधान पहने..
नरम था, 
सलकता था, छलकता था..
स्पर्श देता, स्पर्श लेता 
फुदकता था।
खुश रहे हम, बहुत दिन 
एक दूसरे संग।

एक दिन, 
एक.. भूल से,
किसकी.. कहूं! कैसे कहूं! 
बंध.. ढीला, पड़.. गया 
सूत्र मेरा खुल गया,
हीलियम भरा, मस्तिष्क मेरा 
ले मुझे संग, उड़.. चला। 

आकाश में मैं दूर.. था
अब, उसकी पहुंच से
वह रो.. रही थी,
विलपती..
आंसू बहाती देखती थी
कूदती थी, सूत्र मेरा, 
लटकता..
बस, पकड़ ले...
वह किस तरह 
जतन सारे कर रही थी।
काल की गति एक तरफा 
सामने उसके खड़ी थी।
लाचार थी, वह विवश थी
उदास थी, ओस की बूंदे न जाने
कहां... से, 
चेहरे पे उसके, टंगी.. थीं
देख.. उसकी, आंख... गीली, 
मन.. मेरा भी, भर.. गया,
फूट कर मैं रो.. न पाया
फूट कर मैं.., 
उतने ऊपर
हाथों में उसके गिर गया।

अब खेलती है साथ मेरे 
चुटकुली सुंदर बनाकर 
रगड़ती है गाल पर..
खुशियां बना कर।

जय प्रकाश मिश्र



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