अब बेंच दे भगवान को!
यह
सत्य है!
मित्रों... मेरे,
मिलना.. हुआ.., मेरा...,
सत्य है!
मित्रों... मेरे,
मिलना.. हुआ.., मेरा...,
एक दिन..,
एक, बिलिनियर.. से।
सी. ई. ओ. है, वह.. एक फर्म... का,
पर.. त्रसित है, दुर-ग्रसित.. है,
वह... प्रॉब्लम से।
पर.. त्रसित है, दुर-ग्रसित.. है,
वह... प्रॉब्लम से।
क्या बताऊं?
समस्या..!
उसकी बड़ी है,
अटकी.. हुई है! सालों.. से,
उन्हीं.. बिलियनों... तक,
ट्रिलियनों तक पहुंच.. कर
पेंग.. भरती.. ही नहीं है।
इसलिए..
वह.. सोचता है..
क्यों.. फंसा... है, क्या फंसा है,
क्यों रुका है, वहीं पर,
इतने दिनों से।
उस ही, जगह पर...
खड़ा.. है,
आगे.. नहीं, बढ़.. सका है,
यह सोचकर, वह.. दुखी... है।
और.. आगे...
सरकना.. होता नहीं...
बीते दिनों से.. इसलिए 'वह'
परेशां है! परेशां है! किससे मिले!
और.. क्या करे?
रात.. दिन..
वह, एक रट... में लगा है
कोई, ट्रिक.. मिले,
जिस पर, चढ़े..
और...ट्रिलियनों.. तक,
पहुंच जाए..
वक़्त.. को, धकेलकर,
पछाड़ते...
प्रिय...! सबसे.. पहले!
सब कुछ किए.. इतने दिनों में?
स्टोर.. खोले, व्यवस्था.. दी,
स्टोर.. खोले, व्यवस्था.. दी,
क्वालिटी..
इंप्रूव की, ऐप्स.. डाले
आन.. लाइन, ऑफ.. लाइन बेचता है..
पर हुआ,
कुछ.. भी नहीं!
ढाक के दो पात सा, वह रह गया है।
लालच दिए अनगिनत उसने,
फेंक.. कर, भरपूर दाने...
ग्राहकों को..,
यत्न से अति,
लुभाया.., बुलाया..., पास अपने,
सारे जतन किए...।
अब, क्या करे, वह और आगे...
पूछता है यार!
मुझसे..
वो भी अकेले.. एकांत में,
मैं क्या कहूं!
मैं आदमी
किस... काम का!
बेकार.. का, बेदाम.. का!
निठल्ला.. बैठा हुआ, एकांत.. का!
पर ध्यान.. का, वह.. जानता है..,
इस लिए
आया सवेरे, अल सुबह,
एक दिन, वह.., मुंह.. अंधेरे।
सच कहूं,
उसे.. देख कर!
करुणता..
मुखड़ा पहन.. कर,
आ.. गयी हो.., विनम्रता.. को ओढ़कर,
पास.. मेरे,
उस.. बिलिनियर के रूप में..
दृष्टिभर.., सच दृष्टिभर!
देखा था मैने।
लटका हुआ, रसता हुआ,
सिसक तक पहुंचा हुआ,
फेस उसका.. देखकर!
प्रिय! देखकर..
समस्या... सबके लिए,
संसार में....है,
एक... ही!
दिल.. दुख गया।
आंसू भरी
उन निष्कलुष!
डूबती.. तिरती.. हुई, निष्पाप ही
प्रिय!
सरोरूह के बीच में,
सरोवर में तैरती द्वय मछलियों सी
आंखों को,
सच...! देखकर...
अंदर से प्रिय.. मैं ! हिल.. गया।
मैं हिल गया।
हल्का.. हुआ, थोड़ी देर में..
मैं.. सोच से,
माहौल से बाहर हुआ,
कुछ आत्मगत...होता हुआ
प्रज्ञस्थिति हो गया।
आनंद में, बहने.. लगा...
कहने लगा..
अब क्या बचा है, पास तेरे...
बेंच.. दे, भगवान को ही बेंच दे...
अब उन्हीं को तूं बेंच दे!
मंदिर... बना दे,
बहुत.. सुंदर ..
कहीं पर,
लोक.. का मन मोह ले..
जो.. भी, बचे... हैं, आज.. तक..
ग्राहक.. बनेंगे,; सभी.. तेरे...।
फिर भी न हो, संतोष तुमको
तो
और आगे...
एक चुप, मस्जिद.. बना दे...!
बता दे,
बस उन सभी को...
अकेले एकांत में, रात में,
तेरी है वो..
जो न बिके होंगे, अरे! बिक जाएंगे,
छोड़ हर दुकान वे,
दूकान तेरी आएंगे।
तूं देख.. तो, आज तक!
आस्था से,
धर्म की ललकार.. से,
इस देश में, क्या ना हुआ है?
पर, क्या कहूं..!
पूछना? उनके दिलों से
बनाया है पूर्व.. में
जिन.. सभी ने
इन.. मंदिरों को, मस्जिदों.. को
कितनी.. पढ़ी, नमाज.. उनमें,
कितने.. किए हैं, यज्ञ.. उनमें।
एक..
बात... सुन!
मेरी.. ध्यान से...
सफलता.. एक बीमारी है,
बढ़ गई तो,
सफलता.. एक बीमारी है,
बढ़ गई तो,
असाधित यह, रोग.. है,
चढ़ते हुए अच्छा लगा तो..
उतरना एक त्रासदी है।
चढ़ते हुए अच्छा लगा तो..
उतरना एक त्रासदी है।
तुम रुके.. हो,
अपनी जगह पर, बहुत.. है रे..!
बहुत है रे!
सर झुका, प्रणाम कर,
तूं रुका तो है, बिलिनियर पे।
रुका... तो है, बिलिनियर.. पे।
यह!
कृपा तो है, उन्हीं... की..
पर चाहिए तुझे, सबसे.. ज्यादा..
तो.. सोचता है! इतना क्यूं..
अब, बेंच.. उनको..
बेंच.. उनको, बेंच दे भगवान को।
जय प्रकाश मिश्र
भाव: हमे अपनी आंधी सी अंधी दौड़ पर अंकुश लगाना ही होगा। जो है उसके लिए ईश को धन्यवाद करें, संतुष्टि थोड़े में भी संभव है।
Comments
Post a Comment