खड़े..., सभी हैं, कटिंग.. एज पर,

आप सभी मित्रों को आज के राष्ट्रीय पर्व और स्वाभिमान पूर्ण स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक बधाई। दुनियां आज तेजी से बदल रही है इसी पर कुछ लाइने आपके आनंद के लिए प्रेषित हैं।

आह! लगी.. है, 

जाने.. किसकी, दुनियां... को, 

इस...

देख... न, कैसे...! 

आपस में, 

लड़ भिड़ बैठे...हैं! 

दुखित.. पड़े, 

संत्रसित.. खड़े हैं,

मति मारी है, किसने, 

इनकी

डींग.. हांकते,

एक से बढ़ कर एक खुदी... में।


मतवाले.. हैं, सभी 

अरे! ये...

देख न! कैसे? 

मर... मिटने को 

आपस ही... में, ठने.. हुए... हैं।


खड़े..., सभी हैं, 

कटिंग.. एज पर, 

चिनगारी.. बस एक.. चाहिए... 

उकसावे की

भस्म से पहले, इनको मित्रों...! 


राष्ट्र नहीं ये, बद से बदतर..

व्यक्ति खड़े हैं

सीना... ताने, 

बनी व्यवस्था तोड़ रहे है।

जोड़... रहे, 

गठबंधन ...कैसे...किनसे किनसे 

खुला खेल फर्रुखाबादी खेल रहे हैं।


बदल रहा है, 

विश्व... नित्य यह 

समीकरण चरचरा रहा है,

स्वार्थ सिद्धि और सड़ी व्यवस्था 

बज, बज, बज, बजबजा रहा है।


कौन घटक किससे जुड़ जाए

पता नहीं है, उसको खुद.. ही,

ट्रंप वहां बुदबुदा रहा है

किसपर कितना टैरिफ लादा

पता नहीं है उसको खुद ही।


कारोबार ठप्प हैं कितने, 

कितने रस्ता देख रहे हैं

आखिर, ऊंट... किधर बैठेगा, 

करवट, सारे टोह रहे हैं।


बंदर बाँट, मची... है यारों! 

भय से दुनियां कांप रही है

अगला दिन क्या खिल.. पाएगा

बगिया नित थरथरा रही है।


नित्य प्रार्थना सद्बुद्धि की

हम हैं करते...इन सबके ही

दौर गुजर जाए, मित्रों बस

शांति प्यार से मिलजुल कर ही।

पग दो: आज का आदमी

कौन है? 

ये सो रहा है,

जलजले, पे सो रहा है..

क्या! इसे…, पता… नहीं! 

रास्ते.., सिमट रहे हैं, 

रात.. में,

अंधेरों ने लूट ली है जिंदगी! 

भोर का पता नहीं।


तान.. कर ये सो रहा है

रात भर...

खेस.. अपना, मान कर 

है.. हम सफर.. ! 

क्या इल्म.. इसको 

बदलती 

परिस्थिति!  का.. 

एक रत्ती, भर नहीं..।

बोल दो, 

कोई.. बोल दो

कान इसके खोल दो

जल.. चुकी हैं 

चादरें.., 

जो ढकती.. थीं, इंसाफ.. को

इंसाफ की मैयत उठी है, 

पास के ही देश में 

धमाकों की आग में सब जल गया है, 

जल.. रहे..

इंसान.. की उस चीख.. में

दर्द.. की, पुकार में, 

कुछ नहीं है, शेष… कह दो, 

बचा अब! निःशेष कह दो! 

ताकीद कर दो, 

उसे सच...! 

एक भी चादर नहीं, अब... प्यार की, 

बात.. की, विश्वास.. की

आपसी.. सौहार्द्र.. की

सुबहित बची है।


उसको बता दो, 

नींद से उसको जगा दो।

बेवा हुई ये औरतें, ग़मजदा ये लोग देखे, 

भीड़ देखे...भागते इंसान की।

रोटियों की दौड़ देखे, गोलियों का तौर देखे 

आदमी का हाल देखे, 

नींद... से उठे, अरे!  ये नींद से उठे।

जय प्रकाश मिश्र



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