पिता: चुप.. खड़ा, कोई.. दूर से, मुझे, देखता है
परिप्रेक्ष्य: आज पितृव्य दिवस है, पिता.. अपना मूल..है, जीवन में एक मात्र अडिग.. विश्वास की स्थापित मूर्ति, अभूतपूर्व रक्षा.. कवच, अपने सा अपनी उपलब्धि पर प्रसन्न.. होने वाला, जीवन पर्यंत एक सतत सघन शीतल.. छाया, हर समय अपने त्याग से हमे अवस्थिति.. में गिरने से बचाने वाला यही तो थे, और हैं हमारे पिता। उनके छवि पर आंच न आए हमें आज भी वैसे ही अदृष्ट हो कर भी रोकने वाले। इसी पर कुछ लाइने पढ़ें आनंद लें।
चुप.. खड़ा, कोई.. दूर से,
मुझे, देखता है,
संजीदगी से,
प्यार से
अपनेपने.. से।
ठीक वैसे, सच कह रहा हूं
सम्हाला है, होश.. जबसे।
मेरी, हर..
कांक्षना.., चाहना..,
संभावना.. को आज तक.. एक जैसे।
मुझे... मालूम है,
मेरी आत्मा.. उनसे जुड़ी.. है,
मजबूत.. सच्ची.. डोरियों से,
अदृश्य ही किसी सूत्र से,
इसलिए.. सुख दुख
हमारे एक से।
वह परिधि है,
मैं दूर जाऊं
कहीं.. भी, जिस. काम से..
पाता.. उसे हूं, उस जगह,
उस ही तरह, मैं सामने।
भाव: पिता और संतान में एक सत्य और विश्वास का अदृश्य धागा बंधा होता है। हर संतान की अंतिम सीमा शुरू में पिता की सोच के अंदर होती है और संतान हर जगह, हर समय उसे अपने चहुंओर अनुभव करता है।
वो.. मेरा, पिता.. है,
चुप, खड़ा है, दूर से
मुझे देखता, है
रोकता.. हर एक क्षण
अविरत सतत.. अवांक्षित
अवांक्षना के कर्म से।
भाव: एक पिता अपने संतान को उसके हर नीचे ऊंचे काम, आचरण, चरित्र से रक्षक जैसा ही होता है।
स्पेस देता है मुझे, वह..
मैं…..
पेंग मारूं जिंदगी की, मुक्त होकर,
झूल लूं..
उससे भी ऊंचे झूलना... ,
जितना, उसे… था, झूलना..।
वह एक ही है,
एक ही, सारे.. जहां.. में,
ऊंचाइयों... को, देख मेरी..
दिल... से खुश है, मेरे सा खुश है।
भाव: पिता अपनी संतान का प्रतिद्वंदी, या उससे तृष्ण भाव नहीं रखता बल्कि उसके हर उपलब्धि को शेयर कर गर्व करता है। एक पिता ही है संसार में जो आपको खुश देखकर मन से खुश होता है।
आकाश है, वह!
तना है..
छत्र सा, रक्षा कवच बन
ऊपर.. मेरे, बचपने से..
सर्वदा.. हर हाल में, इस जिंदगी में..।
हर स्थिति में, एक पेड़ है
छाया लिए,
सघन.. घन, मेरे लिए,
हर एक क्षण, हर स्थिति में।
मुझे मालूम है,
विश्वास, नीचे गिर पड़े.., तो गिर पड़े..
निज.. स्वार्थ में,
मेरा पिता अडिग है, हर हाल में
मेरे लिए।
सबसे.. ऊपर दिव्य है, मेरे लिए।
वह… हुलसता.. है,
जवान... सा
आज भी महसूसता.. है
मेरी.. उपलब्धि पर,
गर्व. भर कर... दीपता है
वह.. मेरा पिता है।
मैं जानता हूँ,
विश्वास.. पक्का, है मुझे,
वह एक ही है, जो मुझे पहचानता.. है
भीतर.. कहीं से, अन्तस को मेरे।
माफ कर सकता वही है,
मात्र मुझको.. और मेरे
अपराध सारे, कलुष सारे,
अव-वृत्तियां सब,
फर्च.., दिल.. से, शुद्ध मन से।
भाव: सारे संसार में पिता ही एक प्राणी है जो अपने बच्चे को हर अपराध के लिए मुक्त हृदय हो क्षमा कर सकता है। उसके कर्मो का परिणाम खुद पर ले सकता है।
जय प्रकाश मिश्र
Comments
Post a Comment