बन बहो संगीत तुम.. इस हृदय में।
बन... बहो
संगीत...
तुम... मेरे हृदय का
सूख... पाए, प्रीति...,
पहले तुम भरो
एक गीत,
मेरे प्राण के अंतर जगत में।
मुझको ले चलो
उस पार,
छोड़ो इन सभी का साथ,
दे दो प्यार की सौगात,
तड़पे अब न मेरा गात।
पाऊं मैं नई... दिन रात,
मुझको ले चलो उस पार..
नाविक।
अब न छोड़ो हाथ,
मुझे ले डूब... जाओ
साथ,
चाहे पंक हो या गंग,
मेरे संग... तेरे अंग...
सरिता सी मिलें... ।
सब रंग...
तुम मुझमें समाओ,
आ लगो इस पृष्ठ के संहात,
सब कुछ भूल जाओ।
नदी की तलहटी में
एक घर अपना बनाओ,
हो जहां विश्वास,
शीतल प्रेम की ही छांव,
खाली ही भलें हो हाथ,
फिर भी गुनगुनाओ,
मेरे तुम पास आओ।
छुओ मुझको,
सरल मन से हमेशा,
बहूँ मैं बन पवन
उपवन तेरे
चहुंओर हर क्षन।
खिले कोई कली
स्पर्श पाकर
सूर्य की पहली किरण सी
ही खिलूं मैं।
शिशिर की कंपकंपाती शीति
मृदुलित रात्रि में
मैं उष्णता अनुभव करू तेरे
अधर की।
कमलिनी सी खिली मैं
आ मिलूं, महकती हर प्रात
तुम्हारे पार्श्व में, हर दिन, सुबह
अधर जिसके छुए हों
पास में खिलते हुए
मकरंद पी सौरभ लदे
पारिजात के
कुछ इस तरह मेरे पास आओ।
जय प्रकाश मिश्र
मैं दौडि.. गयो
शिव-मातु परम पद...
जाइ परयो सिर नाइ अपनतर..
बेगि कह्यो आपन तापन सब आपूहि
सुनि लेहुँ बबा जनि देर करो अब।
जय प्रकाश मिश्र।
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