आसमां तो एक... होगा,
पृष्ठभूमि: दुनियां एक ही है और मनुष्य भी एक ही हैं पर देश अनेक हैं। सभी देशों ने अपने अपने नागरिकों के साथ साथ धरती को भी समय के साथ सुंदर और विकसित किया है। सुख सुविधाएं, साज सफाई, विकास के मानक स्थापित किए हैं। मुझे आज यूरोप स्थित बर्लिन जाने का चांस मिला है, यहीं से, सोचता हूं! क्या कुछ वहां अलग हो सकता है। इसी पर कुछ लाइने पढ़ें और आनंद लें।
आसमां तो एक... होगा,
क्षितिज तक फैला हुआ
सागर.... समेटे साथ में
क्या और ज्यादा वृहद होगा ?
रंग गहराता... हुआ
गंभीर.. गाढ़ापन लिए
विश्रांत, स्थिर, आसमानी..
क्या... अधिक होगा।
केदार.. की धरती सरीखा
सोखता हर तीक्ष्णता.. को
मानता हूं, यहां से
कुछ, स्वच्छ होगा, अच्छ होगा।
पर, हवा,
क्या अलग होगी?
शांति के "पर", पर चढ़ेगी
मधुर होगी, और ज्यादा तरल होगी
साफ होगी, पारदर्शी अधिक होगी
संभार से दूषित कणों की
अपेक्षया...
पूर्णतः वह मुक्त होगी!
सुना है!
सफाई बहुत है!
एक भी मच्छर नहीं है,
उस जमीं पर! और शांति है,
निर्मल अनूठी!
तरतीब में हर चीज है,
तहजीब में हर आदमी है..
तंजीम सारी व्यवस्था आदर्श है,
देश वह कुछ अलग है,
इस इंडिया से,
क्या पूर्व से विकसित बहुत है?
मैने सुना है!
देश का मेरे आदमी!
जाकर वहां, शांति से, सद्भाव से
प्यार से, रहता बहुत है।
काश वह, ऐसे ही रहता, यहां पर
हर किसी से प्यार करता
व्यवस्था का साथ देता
सज़, संवर, सुंदर वो रहता
काम से बस काम रखता
मेहनत, परिश्रम खूब करता
हम भी वैसे देश होते
विकसित, अधिक, उनसे भी होते।
जय प्रकाश मिश्र
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