गीत... कोई क्या लिखे!
आज पाकिस्तान ने पहलगाम में धर्म पूछ कर सत्ताईस मासूम भारतीयों की निर्मम हत्याएं अपने भाड़े के और आई एस आई के लोगों के माध्यम से, करवाईं हैं। मन और आत्मा दोनों दुखी हैं। पड़ोसी है अपना ही है पर अपने कर्म से गिरा है इसे क्या बददुआ दूं। इसकी पर कुछ लाइने पढ़ें। दर्द है बहता हुआ आप भी कुछ देर डूबे।
गीत... कोई क्या लिखे, कैसे लिखे,
प्यार का, स्नेह का, माधुर्य का
जब जल रहा हो, हृदय ही,
वेदना की आग में,
झुलसता !
करतूत पर किसी दुष्ट के,
पर सोचता हूं,
यह! बद्दुआ भी, बुरी है
और बीच इसके गुजरना,"संत्रास" है।
संत्रास है यह, मन को मेरे..,
मन मेरा एक फूल.. है,
आरजू... का,
खुशी का..., सबके लिए।
पर,
सोचता हूं!
क्या सच यही था ?
यार उसने, उस जिक्र में! जो
कह दिया था..."हम" नहीं "वह",
वह.. अलग है, स्वीकारता.. है,
बात को इस!
राह.. अपनी, अलग.. ही,
वो.. जा रहा।
घर में रहता
अपने.. खुश वो, कितना सुखद था,
हम सभी का, पड़ोसी है!
प्रिय था मेरा।
प्यार रहता, हम सभी मैं,
बीच में, छोटे बड़े का, अदब रखता।
वक़्त पर हम काम आते,
साथ चलते, जग जीत लाते।
पर क्या कहूं
इस...
खुदाया को!
दया से यह हीन है!
संवेदना, और दोस्ती क्या चीज है...
इस बात से यह... कई कोसों दूर... है।
इसलिए,
मैं सोचता हूँ
जान कर, इसे मूर्ख..
इसको माफ कर दूं, दिल से अपने
जाहिल है ये, ये जानवर है, ये मानकर,
आज इससे दूर हो लूं।
चल... नहा लूं, गंगा कहीं पर!
आज... इसका नाम लेकर श्राद्ध कर दूं।
जय प्रकाश मिश्र
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