जीवन.. जटिल है,
पृष्ठ-परिचय: जो मित्र वैज्ञानिक पृष्ठभूमि के हैं, जानते होंगे कि जीवन की पहली सामग्री एमिनोएसिड होती है, उससे पुनः प्रोटीन, और प्रोटीन को कॉपी करने के लिए डी एन ए चाहिए होता है। इसके बाद कोशिका में ये सब बंद हों और ये सभी करोड़ों करोड़ में से, एक संभावना के चलते कही जीव बनते हैं। तब कहीं एक कोशिका में जीवनी शक्ति आती है। हममें से हर एक ऐसी बिलियन से अधिक कोशिकाओं के बने हैं। अतः समझें कि एक जीवन बनाने में नेचर कितना प्रयास करती है। जीवन बनना कितनी जटिल प्रक्रिया है। फिर भी हम यहां छोटी छोटी बातों में, पंथ, मजहब, जाति, आपसी विद्वेष में इसकी शक्ति नष्ट कर देते हैं। जबकि सारे शरीरो का निर्माण नियति अपने कार्य के लिए करती है, कि लोग उसको स्वस्थ माहौल देंगे और खुशहाल दुनियां बनाएंगे। इसी पर कुछ लाइने पढ़ें और आनंद लें।
जीवन.. जटिल है,
संभावना... है, लेश.. भर
सं..घटित हो यह,
रूप ले,
विश्व के इस... पटल पर।
केवल विरलतम,
आस की... विश्वास की
यह परिणिति.. है,
सफलतम..।
जो, मिल गईं, सब...
उचित.. क्रम ले..
अनगिनत, अविरत...,
सतत...,
हर... प्रक्रिया.., संक्रिया..
क्रियाएं.. इस सृष्टि की
संयोग से, दुःयोग से
एक साथ मिलकर..
तब कहीं जीवन बना.. यह
आपका, कुछ सोच तो!
इसे झोंकने से बाज आ!
अन्यथा के कार्य में, एक बार पहले।
प्रलय.. को भी.. पार करके..
विलय-लय का खेल.. करके
भाग.. ले के,
घन तपन के, शीत के, मरण के
जाने न कितने खेल में।
इसके लिए, बहु उद्यमों से
कुशलता की सफलता से..
सृष्टि के... हर जोड़ पे...।
आज यह जीवन बना है,
सामने तेरे ! खड़ा है
ये तूं नहीं है,
सृष्टि है,
सृष्टि का परचम.. लहरता,
इस रूप में।
बस समझ लो,
एक.. एक.. करके,
अनगिनत हैं.. राज इसके!
कितने... कहूं! हम...बने कैसे !
पार जिसके
आ मिले हैं आज,
हम.. तुम.. और वो...
जो दीख़ता है दूर उतनी..
आदमी का रूप ले के
या वनस्पति में, प्राणि में,
जीवनो का रूप धर के।
सच भाग्य होगा,
कोई तो होगा, कुछ तो होगा
जो जोड़ता... हर एक को,
इतने कठिनतम.. क्रमों में।
जाने न कितने जोखिमों को पार करके
तुम मूर्त.. हो, जीवित.. यहां पर
इस समय पर, इस धरा पर
सोच तो, आसाँ नहीं है
खेल यह! खेल करके देख तो!
तोड़ कर कितनी हदें
दौड़ते.. जीतते.. आगे निकलते..
तब कहीं
एक समय पर, एक उम्र में
इस सदी में..
साथ हम, एक दूसरे के, परिवार में,
संबंध में, देश... में,
इस सृष्टि में..आकर
खड़े.हैं।
इसलिए!
आ मिल, गले!
अंजान हों कितने भी हम!
असमान हों कितने भी हम!
दुश्मन भी हों.. कितने ही हम!
जिन कारणों से, यहां पर..
पर सोच लो..
तुम एक से हो
एक ही हो,
इस सृष्टि ने जिनको चुना है
साथ हों हम इस समय पर
उसके लिए इस धरा पर!
इसलिए मैं कह रहा हूं...
छोड़ दो..
अपनी समस्या,
जिसने बनाया.. इन मुश्किलों में
है तुम्हें,
उसके लिए तो
सब साथ आओ,
छोड़ कर शिकवे गिले
तुम आदमी हो
कुछ तो सोचो!
आगे बढ़ के!
तुम आदमी हो,
उत्कृष्ट कृति हो उस, सृष्टि के।
कविता नहीं मेरी हो तुम!
उत्कृष्ट
जिसको लिख हो देते,
पर सोचते हो! बाद में।
जय प्रकाश मिश्र
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