विवश.. खड़ा संसारी!

पृष्ठभूमि: श्री राधारानी के बृजधाम में, रमण-रेती स्थित, इस्कान मंदिर दर्शन का श्रीलाभ एक बार मुझे भी पुण्यफल वा भाग्यवश मिला। अहा! क्या संगीत! क्या दिव्य भाव में गायन! नर्तन चल रहा था। पूरा आंगन भक्तजन प्रेम-गाधि से अटा पड़ा था। सब विभोर हो, आत्मानंदित थे। तभी मैं क्या देखता हूं एक चौदह से पंद्रह वर्ष की सुंदर बालिका अदभुत-आभामयि, चुहुल-चुटुल, ताजे खिले नागचंपा पुष्प सी उज्जवल, कृष्णप्रेम में विह्वल, फुदकती हुई, श्रीकृष्णविग्रह की ओर पहाड़ी नदी सी वेग लिए चली। मैं देखता रह गया। पर! पहले दाऊ की प्रतिमा लगी थी, वेग के वशीभूत वह उन्हें अनदेखा करती आगे बढ़ गईं श्रीकृष्ण से सामना हुआ ही था कि उन्हें स्व.. मुक्तवस्त्र.. की याद आई, ततः श्रीदाऊ की दृष्टिक्षेप से बचने के लिए मुख पर ओढ़नी रखती हुई वह क्षण भर में कैसे कहां रहस्य सी गायब हो गई मैं विस्मित! खोजता रह गया। सारे भक्त श्रीकृष्णराधारस में विस्मरण हो, डूबे हुए थे और मैने साक्षात! उन सरला की कृपा पा ली हो ऐसी अनुभूति की। उसी पर कुछ लाइने पढ़ें, मां हमे बालक समझ अपनी कृपा से धन्य कर ही देती है। 

मां... अति सरल, 

बालकन्ह.... चीन्ही...

प्रेम-गुहार...., पसीजीं....

निर्मल.... ज्योति, 

प्रगट निज... कीन्ही

गोदी..... मोहि, भर लीन्ही.. ।


निर्मल वायु तरंगित, 

हुई अस..जानो.! 

वसन रूप.. कइ लीन्हीं 

आभूषण सब चमचम चमकैं,

द्युतिमय सब कई दीन्हीं।

मां गोदी..... मोहि, भर लीन्ही.. ।


अँखियन ज्योति मर्म भर, निकसी...

रूप... धरीं संसारी, 

नारी बन!  वहि... दिन  मोहि, 

दर्शन...

रेती मंदिर... मह दीन्हीं...।

मां गोदी..... मोहि, भर लीन्ही.. ।


निपट अकेले, लता सरीखी, 

छोड़... सखी, सब.. धाईं, 

नदी.. बिकल, पर्वत जस.. उतरै 

श्याम सदन चल... दीन्हीं। 

प्रेम-वेग आतुर, अस लागीं 

बरस पड़ी हो बूंद, सुधा की,

माधव... देखि हरष.. उर व्यापी

क्षण मह.... दर्शन किन्हीं।

मां गोदी..... मोहि, भर लीन्ही.. ।


दृष्टि पड़ी, बलदाऊ ऊपर 

आंचल सिर पर लीन्हीं, 

चिल्हक परीं! दिठि दाऊ ज्ञापी

वापस... वहिं , व्हइ... लीन्हीं। 

मां गोदी..... मोहि, भर लीन्ही.. ।


कहां गईं मैं खोजत रहि,  गा

क्षण में, अचरज किन्हीं।

क्षण भीतर, अचरज किन्हीं।

बाजत.. ढोल मृदंग.. वहीं सौं  

कृष्ण नाम, रस... बरसै 

दर्शन मैं पावा अस मां कै 

बात सभी लिख दीन्हीं।

मां गोदी..... मोहि, भर लीन्ही.. ।

श्रीराधादर्शन कैसा लगा: -

निर्मल नेत, नेह बरसावै,

मेघ.. घिरे, चहुँओरा,

शीतल.. छाया हिय तक व्यापी

सुंदर... सुखद...  सवेरा।

विषय-विकार, मोह उड़ि भागे

बहै समीर.. झकोरा। 

निर्मल मन, तन पुलकन लागा,

विवश.. खड़ा संसारी,

मातु कृपा जब बर्षन... लागी

परवश..., मैं... हतभागी! 

जय प्रकाश मिश्र


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