वो मां है मेरी.. जगत का आधार है ।
भाव: ख्वाब सुंदर सपने, हमारे मन की उच्च उड़ान के प्रतीक होते हैं। ये जमीन की सच्चाई से अलग कल्पना के पंख लगा कर हमे आभासी सुख और आनंद के संसार में ले उड़ते हैं। ख्वाब कभी दुख नहीं आभासी ही सही आनंद लोक में ले जाते हैं।
ख्वाब.. तो, बस ख्वाब.. हैं
पर.. लगे हैं, साथ इनके
उड़ते हैं ये आकाश में,
नीचे.. उतरते ही, कहां है।
जमीन पर ये उतर सकें
यथार्थ को ये चख सकें,
उतरने….. को पांव,
इनके… ही कहां है।
दुख दे,
कोई भी ख्वाब,
यह संभव… नहीं है,
दुःस्मृति की छाप का
कोई झरोखा झांकता,
ख्वाब के कपड़ों में, लिपटा
घेर तुझको खड़ा होगा,
पर सच नहीं!
वह ख्वाब होगा,
गर तुम्हे वो दर्द देगा ।
जय प्रकाश मिश्र
पग दो: अक्षरों की शक्ति
भाव: हमारी भाषा और वाक कला एक अतिविशिष्ट मर्यादा रखती है। इसके हर अक्षर और शब्द का चयन व उनका उच्चारण यदि उचित ढंग से, सटीकता से किया जाय तो यह अपने मर्म का संप्रेषण अद्भुत रूप से, ज्यादा गहराई से करता है और अपना लक्ष्य पूरा कर लेगा।
अक्षर... बनें
खुद अक्ष...,दृढ़,
उद्दभव की अपनी.. भावना के,
निःसरित.. हों,
पुष्प से.. मकरंद ले
निज अभिलसित अभिव्यंजना के।
पुष्प के संभार से
खिलखिलाता विहंसता
हंस रहा…यह नित्य
जो मन... में
मेरे….है, उमगता
दृष्टि से, उस देवि के, पंखुरी सा
झरझरा, कर झर उठे,
मैं चुन सकूं
मानस पटल के चित्रपट से।
नवपुष्प सा सुंदर सलोना रूप
मैं उसमे खिला दूं,
उसकी कृपा से,
मह मह महकता जो रहे…
निशिदिन, सबेरे..
झर रहे मेरी कल्पना के व्योम से..।
गूथ दूं
कुछ इस तरह
श्रीमाल! वह प्रिय बन सकें,
श्रीमाल वह कुछ इस तरह हो
शीश पर मेरी मां के
वो, जा चढ़
सके।
जो जगत जननी है हमारी
ऐंकारी, बीज है,
इस सृष्टि का…
मां.. है
सभी की, आदि से,
कल्याण की प्रतिमूर्ति है..
आधार है..,
उस सिद्धिदात्री नवम दुर्गा रूप का
महागौरी नाम से
इस भूमि पर विख्यात है।
संकल्प है,
वह गर्व है, विश्वास है।
वो मां है मेरी..
जगत का आधार है
हर प्राणि का हर जीव का चिर काल से।
जय प्रकाश मिश्र
भाव: मेरी इच्छा है कि मैं, प्रभावी प्रार्थना के पद लिखूं जो लोगों को आदि शक्ति से मिला सके। मेरा विश्वास है कि भीतर के उत्साह से उठे अक्षर और शब्द रचना उस चिर पुरातन शक्ति को प्रसन्न करने में सक्षम होगी। वह आदि शक्ति मातृ शक्ति ही है।
Comments
Post a Comment