चलो खुश कर दें, ”आज” उसे

भाव:  नारी दिवस पर मात्र दिखावा न करें, यदि समाज और हम मात्र अपने भीतर की पवित्रता मात्र ही उन्हें अर्पित करें, तो वह आजीवन अभाव और दुरूह परिस्थिति में भी प्रसन्न रहेगी। उसके सारे समस्या की जड़ कहीं और नहीं हममें ही जुड़ी है। इसी पर चंद लाइने पढ़ें और अगर दे सकें तो निमूल्य उसे अपनी सच्चाई ही भेंट करें।

चलो खुश कर दें,

”आज” उसे 

सद्भावनाओं से, गुलदस्तों से, 

शब्दों से, सब कुछ 

अच्छे से कह के..,

क्योंकि ”आज दिन है उसका”। 

यह, ना-इंसाफी है, बेमानी है, 

पक्की उससे,

सच कहूं, सोचना! 

तेरी.. तुझसे, खुद की खुद से।


अरे! कुछ अच्छा सोचो,आज!  

रोज से आगे बढ़ के,

वो कल भी खुश रहे ऐसे ही, 

मुस्कुराए, 

आज ही नहीं, 

आज के आगे से, इससे बढ़ के।


वो जब भी तुम्हे देखे, 

सोचे, खयाल करे, 

तुम इतना साफ रहो, 

अंदर,दिल से, 

अपनी पवित्रता से

तुम्हे देखे वो, तो खिल जाए 

अगर मैं अपनी कहूं तो 

ताजे महुए के महकते, फूलों सी

निखर जाए।


जब भी वो तुम्हें देखे, 

एक रौनक, 

उसके ऊपर बिखर जाए,

वो लहरों सी उछल जाए,

जब भी तुम्हे छूए,

अपनेपन से,

वो सिहर जाए।


तुम दे सको 

अगर, आज उसको

तो अपनी, उन्वानी उसे दे दो।

आज दिन है उसका,

आगे..एक, सच्चा कदम तो 

बढ़ाओ सभी मिल के। 

जय प्रकाश मिश्र

प्रेम की वह मूर्ति, सच करुणामयी हैं।

उसे, 

दुख-देने-वाले-को, 

गर-गलतियों-का, अपने

खुद-एहसास है,

इससे-अधिक, 

अब और-उसको, चाहिए, ही-क्या? 

कहती-हुई-वह! 

बहती-हवा-सी, दृष्टि से, ओझल हुई। 


मैं रो पड़ी, 

क्या यहीं तक दास्तां थी,

बात सारी खत्म, 

खत्म है सारा बखेड़ा।

जिस दंश का 

वह करकता, रिसता हुआ, दर्द लेकर 

ये झेलती है, उम्र भर, 

अब शांत है, 

इस बात से बस, 

वो-मानता-है-गलतियां..प्रायश्चित-करेगा

शेष सारा वह, प्रभू पर छोड़ती है।

और दिल से कह रही है… 

माफ कर दे, 

ऐ खुदा!  तूं गलतियों को 

आज उसकी  माफ कर दे,

मैने सुना है, मन से भी वह कह रही है

ऐ खुदा! तूं उसे, अब माफ कर दे! 


सर पीटता मैं आज जाना..

इसलिए ही सच कहा है...  

नारी है वो, सबसे बड़ी है।

प्रेम की वह मूर्ति है, करुणामयी हैं।

जय प्रकाश मिश्र

खुशियों से भर के मां ने 

कुछ अलग मैं, क्यों कहूं? 

कसम है मुझको 

मैं जिंदगी से, हट कहूं! 

सच है 

आज पापा मेरे पहली बार मुस्कुराए

कल देर रात जब 

वो घर आए

एक डिब्बे में गरमा गर्म मिठाई 

भी साथ लाए।

क्या कुछ, आज हुआ होगा

मै सोचता रहा, देर तलक

मां ने खुश होके 

सबको प्यार से, 

भीगी आंखों देखा, 

पर,मैने चुपके,चुपके देखा

घर के कोने में पड़े, पुराने

मंदिर में दो दीप आज

सच्चे देशी घी के 

अरमानों के,पूरा होने पर 

खुशियों से भर 

मां ने 

कितने उत्साह से जलाए।

जय प्रकाश मिश्र




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