घर में अपने, खुश तो.... रह।

भाव: लोग अपने जीवन में प्रायः नग्न चालाकी दिखाते हैं, जब उनका काम निकल जाता है तो आप को ठेंगा दिखा देते हैं। लेकिन यह कोई अनहोनी नहीं, हमारी प्रकृति और सामान्य मानव प्रवृत्ति ही यही देखी जाती है। गुलाब के पेड़ को ही लें, जैसे ही जाड़ों में कलियां उनमें आती हैं कलियों वाली डाली तेजी से ऊपर शीर्ष से ऊपर आ कर कलियों का गुच्छ बना पुष्पनाल को और आगे बढ़ाती, पेड़ से बहुत दूर अकेले में खिलती है। लोग भी ऐसे ही हैं, चालाक चतुर! इसी पर कुछ संक्षिप्त लाइने आपके लिए।


पत्तियां, थीं साथ सारी, 

डंठलों में, एक संग,

उमड़तीं, 

बढ़तीं बिलसतीं 

अंग भरतीं, रागरंग।

पर 

क्या कहूं!  

यौवन को इस, भरमा दिया, 

भेद, अपने बीच में ही, 

ला दिया।


देखते ही देखते..

अलग थीं 

अब, 

डंठलो..से पत्तियां

दूर आगे बढ़ चुकी थी 

खिल... रहीं 

ले अलग, अपनी वे कलियां।


एकता थी, 

बस तभी तक

जब तक नहीं थीं, 

पेड़ पर इस, खिली कलियां...।


देखता हूं! 

आज कलियों के निकलते 

पेड़, बेचारा हुआ है!   

किसी सोच में डूबा हुआ

वह चुप खड़ा है।


संग ले कलियों को डाली 

अलग पींगे मारती है,

लग रहा है पेड़ को ठेंगा

दिखाना चाहती है।


देख कैसे 

लरछियां हैं निकल आईं! 

बीच से, इन पत्तियों के! 

इन पत्तियों से, 

भागती.. हैं, दूर ये!


हर लरछी अलग, 

कैसे विलग! 

छोड़ती सब जा रही हैं

विमुख होती, पेड़ से इस, 

त्वरित गति से 

खिलखिलाती हंस रही है।


फूल यह!  

उन्माद में इस पृष्ठ ऊपर.. 

डाल पर, सच अलहिदा सा

लद रहा है, लश* हुआ है, 

लस* रहा है।

आकर्षण हुआ है हम सभी का।


मानव है तूं!  

क्या अलग.. है, 

इसकी नियति से

इस प्रकृति से, इस सृष्टि से

जानता हूं! 

तूं.... 

जो ऐसा कर रहा है 

यह नियति ही है,

यह मान कर 

तुझे… छोड़ता हूं, 

चल आज से तूं, अलग… रह! 

ध्यान रख अपना ही तूं अब

पेड़ की इस फूलती, 

फल लगी, डाली तरह।

चल, घर में अपने, खुश तो.... रह।

जय प्रकाश मिश्र

स्वरचित मूल रचना

Comments

Popular posts from this blog

पेंशन बिन जिंदगी, मेरी ये खाली हो गई है।

मेरी, छोटी… सी, बेटी बड़ी हो गई.. जब वो.. पर्दे से

चलो पेरिस की एक शाम से मिलें!