रस नहीं अब हाय! कोई जिंदगी में।

वो, सुतलियां दाबे हुए था कांख* में

और बट* रहा था रस्सियां 

एक हाथ से, 

घुमाता था घेर* को, 

कुछ देर पर, 

पर! 

आह! कितने लाड* से।

भाव: गांव में लोग जीवन को मेरे बचपन के समय बड़े स्वाभाविकता और सहजता से जीते थे। खाली समय में सुतली से रस्सी* बनाने के लिए प्रायः बरसात में जब और कोई काम, खराब मौसम के चलते संभव नहीं होता तो बगल में* सुतली दबाए और एक लकड़ी का क्रॉस जिसे घेरा* कहते थे, इसमें एक लोहे का रॉड उल्टे U के आकार की फिट रहती थी। उससे सुतली फंसा कर बड़े प्यार से धीमे धीमे हाथ से थोड़ी थोड़ी देर पर घुमा घुमा कर रस्सी बनाते और उसी में लपेटते रहते। साथ साथ आराम से बैठ कर या खड़े हो बड़ी देर तक रस्सियां बटते और रिमझिम बरखा में खूब बातें भी करते रहते थे।

वो...,

एक समन्वय, 

जी रहा था, जिंदगी में, 

सोचता हूं, आज, 

हाथ से, उन गुजरती 

सुतलियों की धार के संग,

घेर की गतिशीलता में, 

एक-सार ऐंठी रस्सियों में,

बात में, व्यवहार में

जो जोश भर कर, कर रहा था, 

साथ में।

भाव: कितनी समन्वय पूर्ण लाइफ थी तब, बहते हुए झरने सी मंथर बहती थी, सच! कल कल करती छनती थी कठिनाइयों के बीच से और एकरस थी, स्थिर थी, हिलते पत्ते सी अभावों के बीच हवा के साथ उमंग भर भर हिलकती आगे बढ़ती थी। उस समय रस्सी कातते समय कितना सहज वो व्यक्ति लगता था जैसे सब काम स्वतः होता जाता और बातों का क्रम अनवरत चलता रहता था। 

उन चू रही, 

गजब की आवाज करती 

ओरियों से गिर रही, 

निकलती आवाज में, कैसा समन्वय!

आहा बंधा था! 

रिमझिम बरसती, घटती, बढ़ती 

रह रह गरजती, 

ले.. झोंके.. बहती, हो रही 

बरसात में, 

और संग उसके, 

तेज होती, मधिम होती 

वाल्यूम में 

चल रही, उस समय की बात में।

भाव: एक सतत तारतम्य स्थापित हो जाता था कितनी आवाजें आती थीं, बूंदों की टिप टिप, पानी का लहरा घुड़दौड़ सा भागता, झोंको की झपर झपर, खपरैलों के ओरियों से टपकती या गिरती जलधार की ढरढर या ढबढब और अव्यतिक्रम लिए बातचीत अपने घटते बढ़ते वाल्यूम में। समय का पता ही नहीं चलता था।

पर ध्यान से वो देखता था, 

रस्सियां एक सार हों 

लपेटता था 

बाध को, व्यवहार से।

बात करता, 

खेत और खलिहान की 

ठठ्ठा लगाता, 

मस्त रहता, व्यस्त रहता

उन बरसती, रिमझिम, सलोनी शाम में।

भाव: वो शामें सुरमई रूप में नहीं, अनुभूति में थीं अदभुत थी, अनुराग और प्रीति भरी थीं, हंसते उर तेज हंसने की आ आवाजों से लदी हुई थीं। 

मुझे याद है,

भीग जाते थे सभी 

रंहटे, लगावन, 

झूमती, पागल कहूं, मैं क्या कहूं! 

उस अनवरत, 

नटखट, शरारत से भरी 

हो रही,  पाक्षिक बरसात को।

भाव: तब बरसात आज सी, एक या दो दिन के लिए नहीं, झपसा पड़ता रहता था, पंद्रहों दिन सतत झिप झिप और लहरा ले ले के, नाचती गाती बरसात होती थी, भोजन बनाने की सारी लकड़ी, गोइथा, रहन्था, संथा भीग जाते थे और तब मर्द लोग बाहर लिट्टी चोखा और डाल बनाते थे पर उसमें कैसा स्वाद होता था। अपने घर का देशी घी का क्या दानेदार, और स्वर्गिक स्वाद अहा!  मिलता था।

तब कहीं से आवाज आती, 

आज बदरी, बहुत भारी हो रही है

तन है भीगा, मन है भीगा, 

संग सारा, 

लगावन है भीगा

इसलिए अब, छोड़ 

सब कुछ,आज, हम कोशिश करेंगे..

बाहर बनेगा, आज खाना, 

तब गूथकर, और भूनकर, 

लिट्टियां कंडे में रखकर

सुलगते अहरे के ऊपर

उठते हुए उस धूम्र का वह रूप 

मुझको याद है।

लिट्टी व चोखा संग उस 

पहली पानी, दाल का, 

वह स्वाद मुझको याद है।

रोशनी तो थी, 

मगर धीमी बहुत थी,

पर शिकायत कोई नहीं थी 

बदलियों से

घेर कर जो सूर्य पर ही क्यों कहूं

चांद पर भी

कब्जा किए थीं, एक दो सप्ताह से।

भाव: मद्धिम रोशनी में शाम को ही सब बनना शुरू होता और क्या थी वह पहले पानी की दाल अपने घर की कैसी बस मैं सोच सकता हूं बता नहीं सकता।अद्भुत स्वाद का भोजन सब करते थे और झमकती वर्षा के मध्य वह दावत ही होती थी।

वह

घुमाता था, घेर को 

देर थोड़ी, देर में, 

और बट रही थीं रस्सियां, 

उस हाथ में, 

मेरे जिस्म की, मैं सच कहूं तो 

बट रही थी जिंदगी, 

रस्सियां बन

जिंदगी की जिंदगी में

क्या कहूं! 

अब दूर हूं, सोचा नहीं था, 

बंध रही थी जिंदगी, उन रस्सियों में

रेशों में उन, 

तंतु जिनके सूख कर है, मृत हुए

रस नहीं अब हाय! कोई जिंदगी में।

आज की इस उड़न छू बरसात में

बाहर निकल, कहने लगा मैं 

रस नहीं अब हाय! कोई 

जिंदगी में, और इस बरसात में।

भाव: यह सच है उन दिनों की तुलना में आज जीवन में पाने वाली सब चीजें पाकर भी कोई रस, आनंद निश्चिंतता नाम की चीज नहीं रही।

जय प्रकाश मिश्र


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