देखा आज, सुर्ख-ए-गुलाब

देखा आज, 

सुर्ख-ए-गुलाब 

की बेटी 

खिलती कली 

मधुर.. इठलाती, 

उसांसे भरती

हल्के.. 

हल्के 

पर

खोलती,  

पहला-पहला.. पर,

मुक्त उडॉन की तमन्ना, संजोती 

प्यार से खिल रही, प्यार में खिल रही।


जीवन की पहली, स्नेहिल मुस्कान लिए..

भीतर उठती नई पहचान लिए..

कस-कसे, सुष्ठु तन, 

प्रफुल्लित मन।

 

शीत की 

अंधियारी, 

कंप..कंपाती 

निर्जन… रात्री  

निडर, बेखौफ छूने को 

निर्मल चांद इतनी…उतावली

अपनी दुनियां में कितनी मगन।

हाथ में ही हो जैसे सारा गगन।


सरे.. राह, इतनी सुबह..! 

खिलने को तैयार

किस हद.तक..

पृष्ठों 

पर, 

पारदर्शी, 

निखरे, ढुलकते, हीरक कण 

चमचम चम, शीतलतम 

ओसबिंदु… पहने 

जैसे हों गहने..।


सच कहूं, 

अरुण 

की 

पहली किरण का इंतजार, भारी था।

पल, प्रति पल उसका 

भीतर से खिलना 

जारी 

था।


कुछ 

ऐसे ही…रंग 

जीवन में भी भरे…होते हैं,

खिलते…. भी हैं, 

चढ़ते.. भी है 

वय.के.साथ 

ले ले उम्र के…पड़ाव।


उस उम्र के ही…. रंग लेकर.. 

साथ में हर ओर… तेरे

मन में हि क्यों…, तन को समेटे तेरे।

चौगिर्द, हर वयस… में 

चढ़ती.. उतरती.. वय में

अंदाज…लेकर 

जिंदगी का..

पक गई हो, कच्ची हो, 

अधपकी हो फर्क क्या,

रंग तो रंग है 

हमेशा ही हर उम्र के संग हैं।


फिर भी 

ये जिंदगी है। 

रंग इसके एक दूसरे से

जुदा.. जुदा..भी है,

खिलने में, खिलते हुए, दिखने में।

कुछ रंग सपने लिए होते है

सपने…किसके. नहीं होते है 

हर उम्र में…

ये ही तो उम्मीद…लिए फिरते हैं।

रंग सपनों में ही तो.. भरे रहते हैं 

निखरने को, निखर के खिलने को।

जय प्रकाश मिश्र

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