वे हमारे देव हैं! हमारी पीड़ा का अहसास है उन्हें…
भाव: आधुनिकता और विकास का मूल्य सबसे नीचे वाले पायदान पर खड़ा आदमी और नींव का अबोल पत्थर ही सहता है। उस चुप बिना आवाज वाले आम आदमी की आवाज को मैने स्वर देने का प्रयास किया है, इन लाइनों में। जैसे हाइवे से फर्राटा भर कर जाने वाले कभी उस हाइवे के आस पास, नीचे तलहटी में या किनारों पर पड़ने वाले गांव में बसने वाले गांव के ग्रामीण का दुख नहीं जान सकता कि उसकी कितनी कीमत वे आजीवन पुश्त दर पुश्त देंगे। आप पढ़ें और आनंद लें, कुछ कभी कर सकें तो कोशिश भी करें।
आप ने बनाई हैं,
बहुत सुंदर... आरामदेह..
सड़कें,
उनपे.. चल के, आज खुद
देखा.. मैने।
पर! क्या कभी..
ये भी सोचा है..आपने..,
इन सड़कों ने...
कितना अलग! कर दिया है हमें,
हम सभी को,
आपस में।
हमारे बीच.. से, हमारे सीनों..पे ।
एक वास्तविक..
लक्ष्मण रेखा… ही, खींच दी है
आपने…इनसे,
हमलोगों की रोजमर्रा जिंदगी में।
बिना जाने… बिना पूछे…
हममें से किसी का भी मंतव्य,
बिना हमारी सहमति, वा रजामंदी के,
हमारे ही खेतों के बीच से,
आपने अपने,
आने जाने की जरूरतों,
और कुछ दूसरे लोगों के हित में
दूरी... कितनी कम कर दी है,
इन सड़कों से।
यही दीख़ता होगा आपको!
हम साधारण किसान हैं
पहले से ही,
अपनी समस्याओं से
काफी परेशान हैं..
हम तुम्हारे इन, सिपहसालारों,
और तुम्हारी इस ताकत के आगे
क्या हैं?
कुछ भी तो नहीं!
पर पूछ तो सकते हैं?
क्या तुम्हे पता है?
हम ग्रामीणों के आपसी गांवों,
और लोगों के बीच की दूरी
जो फुटो में थी, आपने सदा के लिए
किलोमीटरों में कर दी है।
सच कहूं आपने तो मेरे लिए
मेरी बाजार, मेरी जरूरतों
और मेरे अपनों के बीच
चाइना की लंबी दीवार ही
खड़ी कर दी है।
अच्छा होता…
एक प्रस्ताव बनाते, पहले
डिस्कसन तो करते.. हम सबसे।
हमारे, इन हाइवे के पार वाले,
खेतों का आपसी संविलयन,
विस्थापन इंतजाम तो करते।
और फिर बनाते ये सड़कें
आलीशान, तो
हम भी
तुम्हारे साथ मिलजुल फूल सा खिल,
मुस्कुरा लेते।
अंधों की तरह काम करना
समझो बहते पानी में ही है डूब मरना।
यारों देखा आज
एक अजब कमाल
रेलवे ने पूरी लाइन के किनारे किनारे
ऊंची सीमेंट बाउंड्री खड़ी कर दी है।
बंद कर दिया है हमारा
सदियों का, सतह वाला, रस्ता
हमसे, इसके लिए, इन्होंने
कभी भी नहीं, पूछा।
किलोमीटरों बाद
एक छोटा सा "बच्चा गेट" खोला है
मैने पूछा जब सारी लंबाई में
बाउंड्री घेर ली
तो ये बताओ?
इन नदी, नालों, के ऊपर,
क्यों छोड़ दी?
बांध दो उन्हें भी, वहां भी
बनाओ बाउंड्री.. पानी के ऊपर!
गरीबों, दुखियों के रास्तों के लिए
आपकी बाउंड्री है..
बलवान प्रकृति पर भी
जरा वही चाबुक चलाओ।
डरते हो, उनके प्रकोप से
भय खाते हो
इसी लिए उनके पास और ऊपर
तुम अपनी ये
बाउंड्रीवाल नहीं बनाते हो!
ध्यान रखना वे हमारे देव हैं!
हमारी पीड़ा का अहसास है उन्हें…
तोड़ देंगे वे, ये सारे तुम्हारे खिलौने
किसी दिन देख लेना
केवल और केवल हमारे लिए।
जय प्रकाश मिश्र
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