खोया हूँ कहीं अपने में.. भीतर

भाव: सामान्य आदमी बहुत बड़ा काम कर सके अमूमन संभव नहीं है, लेकिन इससे फर्क भी नहीं पड़ता। पर हमारी भावनाएं, काम और प्रयास पॉजिटिविटी का संस्पर्श करे यही महत्वपूर्ण है, जरूरी है और पर्याप्त भी। अच्छा काम छोटा हो या बड़ा बराबर प्रशंसा का हकदार है। अतः अपनी सीमा में और अपने जगह पर जो अच्छा कर सके करें । इसी पर हल्की फुल्की कुछ लाइने प्रेषित हैं, आनंद लें।

चल छोड़ याराँ, बात सारी, 

पास आ, सांस तो ले, 

देख कैसे... तप रहा सूरज 

यहां पर

सूखते, इस लरज़ते, 

पेड़ को 

पानी तो दे..।


दब रही है, चुप पडी है, 

घनी छाया में उगी है, 

देख कैसी पादपी.. 

सुंदर मनोहर

एक दर्पण रख यहां, 

कुछ उजाला, कुछ उष्णता

सौर ऊर्जा इसे भी दे।

चल छोड़ याराँ, बात सारी, 

पास आ, सांस तो ले।


पत्तियां सूखी हुई हैं, 

इस बाग में फैली हुई हैं,

दूब को ढक, शीर्ष से 

बिखरी पड़ी हैं,

ये दूब पीली पड़ गई है, 

बीच इनके...

साथ मेरा तूं भी दे, 

मेरे काम में..

चल छोड़ याराँ, बात सारी, 

पास आ, सांस तो ले।


बह रहा वर्षा का जल.. 

तूं देख कैसे,

पास से इस सरोवर... के 

भर सके यह, 

पी सकें पानी सभी 

इसके तटों पर 

प्यास सबकी मिट सके,

चल बना एक बंध 

पतला किनारों पे

चल छोड़ याराँ, बात सारी, 

पास आ, सांस तो ले।

जय प्रकाश मिश्र

पग दो: चाहत

पिलाते हो 

रकीबों* को, मेरे मौला,  चाहने वाले*

मुकद्दर तुम! 

लवों पर, अब मेरे, 

बस, नाम तेरा चिपक पाता, 

कितना अच्छा था।


मिलेगा क्या, मुझे ईनाम! 

इबादत का तेरी... 

तूं जान! 

मुझे तो फक्र तेरा 

बस बचे

इनाम अच्छा था।


तेरी नायाबियत... की क्या कहूं! 

हर शख्स को पाया, 

तेरा हस्ताक्षर.... 

है, वह..

जहां भी, जब कभी 

पाया तुझे पाया, तुझे पाया।


मेरे मौला!  

सुनो एक सच!  

किसी के दिल में, मैने जब, 

टटोला, बे-सबब, मतलब

तेरी आवाज ही पाया

तेरी आवाज ही पाया।

जय प्रकाश मिश्र

पग तीन: संसार में मैं

कुछ के पत्ते सुंदर होते हैं,

कुछ की नस नाड़ियां..।

डंठलें मोटी, मोहक..

कुछ के फूल, रंगीले.. अद्भुत! 

कुछ के सौरभ की खुशबू 

कैसी मनहर! 

कुछ के पत्तों के रस 

अजीब सी सुखन दे जाते हैं 

जिह्वा पर आते जाते उड़ती उड़ती।

सोचने लगा मेरे में क्या है

कुछ भी नहीं..

मात्र देखना, गुनना, गिनना 

इन सबके गुण।


सुनता हूं मीठी बोली चिड़िया की

ठंडी हवाएं, काली घटाएं 

बल खाती, बेलि 

हहराती नदी पास में

हरियायी दूब की फैली चादर! दूर तक

खोया हूँ कहीं अपने में.. भीतर 

सोचता हूं

इनके बीच मैं कैसा दिखता हूंगा।

जय प्रकाश मिश्र

भाव: आदमी प्रकृति से भिन्न नहीं। उसके सारे मौलिक सुख प्रकृति के साथ ही हैं। अन्यथा वह शुष्क रह हो जाएगा। सम्मिलित जीवन ही आनंद है।

Comments

Popular posts from this blog

पेंशन बिन जिंदगी, मेरी ये खाली हो गई है।

मेरी, छोटी… सी, बेटी बड़ी हो गई.. जब वो.. पर्दे से

चलो पेरिस की एक शाम से मिलें!