तृप्ति आंखों को हुई,
भाव: संगीत, उन शब्द ब्रह्म का, दिव्य रूप है। जब यह अपने स्वभाव में गाया बजाया जाता है तो हम विभोर हो जाते हैं और अगर हम प्रकृति के संगीत को सुनने की क्षमता अपने में पैदा कर लें तो सदा राह चलते हवाओं के, चिड़ियों के, वनस्पति के पत्तों के गीत, संगीत सुनेंगे, और प्रसन्न रहेंगे। इन्हीं पर कुछ एक अपूर्ण पंक्तियां पढ़े और आनंद लें।
संगीत... की सरिता.. मधुर... मंदाकिनी
शीतल.. तरंगित.. षडज सी
जब धार पाती, प्यार की..
घोलती शीतल.. मधुर रस.. चांदनी..
हा! कर्ण... में
तन रसों को, मन रसों में..
मेलती...अंदर कहीं
किस तरह आ बैठती, समव्यापती..।
हेर* कर, हरती* मेरा मन,
चित्त को कर चित्त*, यह आरूढ़ होती
जैसे कोई हो रूपसी, संयासिनी।
शक्ति का यह रूप निर्मल
पत्तियों में झरझराता,
झांझरों सा बज रहा है..
कूक कोयल की उठी है.. पास ही
हूक हो, कोई, किसी की
प्रियतमा के हृदय में
विरहाग्नि की।
टिप टिपाकर बूंद ऐसे पड़ रही हैं
संतूर कोई बज रहा हो...
दूर रेगिस्तान में.
सरसराती.. फागुनी ठंडी.. हवाएं
कह रही हैं
आ, पास आ, थोड़ा और सट जा
निकट से।
जय प्रकाश मिश्र
पग दो: एकनिष्ठ
कोई चलता है
दिया ले के, मेरे रस्ते पर
दिखाता रस्ता…
पीछे.. पीछे.. आएं मेरे..।
एक हाथ से, देख तो!
उसने... कितने सलीके से
घूंघट भी थाम रखा है...
मुझे दिखता ही नहीं,
तिस पर भी वही रस्ता
पर, चहुंओर गजब दिखता है..
वो चलता है सरपट, कैसे,
सोचकर हैरां हूं..
छोड़ सब कुछ... हो एकनिष्ठ
बचाते हुए जलता दिया..
घूंघट को सम्हाले, पकड़े
उतने छोटे छेद में दृष्टि जमाए हुए।
जहां मैं भटकता हूँ मुक्त होकर भी
जाने दिन कितने हुए
उन्हीं रस्तों पर
आज भी जरूरत है मुझे
किसी के दीए की यहां।
जय प्रकाश मिश्र
पग तीन: बीता हुआ कल
बीता हुआ कल,
खड़ा था मेरे सामने
पहने हुए था आखिरी पैबंद…
पर वह चुक, चुका.. था
इसलिए आवाज.. प्यारी हो गई थी,
झुक.. गई.. थी, भीतर कहीं
नरम थी,
ज्यादा, नमी ले बरसती,
होठों को छूती
सूखते मुंह को, दिलासा दे रही थी।
जय प्रकाश
पग चार: आज की बनावटी दुनियां
जगमगाते… दीप,
चुन-चुन चांद की उस सरजमीं से
आ गए थे, आबाद.. थे,
हंस, खिल.. रहे थे,
रौशनी ले मिल रहे थे,
प्यार से.. प्यार में, सच! हर किसी से!
पर क्या वो ….
एक दूसरे को, जानते, पहचानते थे
नहीं तो, बिल्कुल नहीं
एक भी को…
बस नफासत चांद की ओढ़े हुए थे
तारे थे वे, किसी और जग के
उतरे हुए थे इस जमीं पे
बस एक दिन को..
आज ड्यूटी जमीं पर… वो कर रहे थे।
पग पांच: बदलता विश्व यह पूछो नहीं
चटख रंग पहने हुए,
सरदारनी, बहती हुई दरिया सरीखी
आ गई, छा… गई
तृप्ति आंखों को हुई,
महफिल को सच, वो भा गई।
दौर था, सब चल रहा था,
देखते ही देखते
नजरें हटीं
अब और कोई
नाजनी आगे खड़ी थी।
भाव: संसार गतिमय है, हर क्षण बदलता रहता है। हमारी प्राथमिकताएं, दृष्टिकोण, और नजरिया भी हर समय बदलता रहता है।
जय प्रकाश मिश्र
Comments
Post a Comment