तुम लिए हो आग को, उस हाथ में
भाव: सच्ची बातें सदा से सभी को कडुई लगती रही हैं, उनके लिए बोलने वाले लोग 'सारी' भी प्रायः सदाशयतावश कह देते हैं। पर क्या सच्चाई बदल जाएगी, नहीं वह वैसे ही रहती है। बार बार अनदेखा करने से वह एक दिन भयानक रूप ले लेती है और फिर संभाली नहीं जाती। इससे बचना चाहिए। गरीबों की मजलूमों की'आवाज लगातार दबाने से वह आग बन सकती है अतः उनके जज्बातों की भी कद्र होनी चाहिए। उनके लिए बोलने वालों पर प्रतिबंध नहीं होना चाहिए।
कह गया मैं...
मैं गलत.. था, मैं मानता.. हूं
छोड़ दो...,
तुम ही बड़े हो, बख्श दो!
पर सोच... तो!
वो.. जाने कबसे,
किस तरह, घेरकर... उनको खडे हैं।
उनके लिए तो सांस के, लाले पड़े हैं।
मैं क्या करूं...; बोलूं नहीं..,
मर रहे.., हाशिए पर जी रहे...
इन बेगुनाहों, गंवारों, पराश्रितों,
के भी लिए।
स्वर नहीं है.. पास इनके,
बिक.. गए हैं.. बोल सबके...
चुप... खड़े, सदियों से हैं.. ये
सह रहे सब... शांति.. से ये..।
मौन भी तो.. बोलता है
आखिर कभी.. पट खोलता है,
एक दिन तो व्रती भी,
रखा हुआ व्रत, तोड़ता है।
क्या प्रतीक्षा... इसी की है..
आज सबको..।
अरे! तोड़कर जब यह किनारे,
नदी... उफनाती हुई...
फुफकारती.., अडेल देती..., घेर लेगी,
महल तेरा, क्या करोगे?
शक्ति तेरी क्या करेगी?
पीट डालो, पीड़ डालो,
नृशंसता का नाच नाचो
तब उमड़ती भीड़ ..यह
सब कुछ करेगी
अपनी करेगी, और बस,
अपनी... करेगी बह.. चलेगी धार में
साथ लेकर, सच! कहीं
सबका बसेरा, सबका बसेरा।
"एक" शब्द होगा
नदी का...तुम ध्यान देना...
गरजता, चिंघाड़ता... आवाज करता..
आवेश में..,आवेग में...
जब वह..., किनारे तोड़ती है,
गड़गड़ाता, गरगराता, हहकार करता...
निकलता है शब्द वह...
रोके नहीं वह, कभी.. रुकता,
कुछ करो तुम!
शब्द वह, आगे है बढ़ता!
पूछते हो ऐसा क्यूं है...
अरे! वह तो प्राकृतिक है, सत्य है,
छल से रहित है,
आत्मजाता, ही नहीं, वह अमर भी है।
बह गया है, अगर कुछ,
मुंह से निकल कर..
बहने ही दो, अब, इन्हें बाहर...
क्यों पकड़ कर रख लिए हो...
तुम उन्हें.., इस तरह! डर से।
तुम लिए हो आग को, उस हाथ में
यह सोच लो..।
पास अपने, रख लिए हो,
शब्द मेरे... छोड़ दो..।
ये शब्द हैं अक्षर बने, मात्रिकाओं संग ढले।
जय प्रकाश मिश्र
पग दो:
मैं बिखर... कर खो गया हूं
नक्षत्रशाला... में तेरी..इस
क्या करूं...
मजबूर.. कह सकता नहीं,
मजदूर बन,कर रह गया हूँ
नाट्यशाला में तेरी इस।
क्या करूं....
काम करता रोज हूँ, मै शाम तक
अधिक देता तूं है
इतना पारिश्रमिक
ढोते ढोते थक गया हूं।
यार कुछ मुझको तूं दे दे,
और बस
जिंदगी को छांव में मै, जी सकूं।
जय प्रकाश मिश्र
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