साइकिल ही ठीक थी।
पंक्तिकुल प्रथम: एहसान फरामोश दुनियां
जी हां! कुछ एक!
दीवाने…मतवाले, हिम्मत वाले …
लोगो की,
किस्मत से …पैदा होते है…
सपनो में, जागते.. सोते..
कोई.. सच्चा ख्वाब संजो.. लेते है।
”मैं बदलूंगा इस दुनियां को”
तबियत से..“चुन लेते हैं”।
कुछ कर गुजरूंगा…
सच ही... जीऊंगा..
सारा जीवन... अर्पण... दूंगा
वे तय करते हैं।
फिर लग जाते हैं, तुल जाते हैं।
सच है!
मैं जानता हूँ
उनमें से कुछ तो इस
धधकती आग में झुलस-झुलस
मर.. भी जाते हैं,
भर जीवन वे खप जाते है।
पर जो बचते हैं
मकरंदों की खुशबू बन
सूरज की रौशनी पहने
मानवता को, जिंदगी दे जाते है।
चंदन की भीनी भीनी सुवास से,
नखशिख, चतुर्दिक, भर जाते हैं।
फूल नहीं! जीवन उनका!
वो अंगारे हैं!
तपना! उनका काम!
सदा जीवन हारे हैं,
कौन करेगा याद,
उन्हें… वो जिस घर जन्मे..
छूँछी हो गई डाल
वो जिस बगिया में फूले।
चंदन सा महक रहा वो घर,
जिस आंगन वो खेले।
दुनियां है, …यह!
सिर..., नीचे कर..., अंधी हो..
हरियाली… चरती है
बादल… कितनी..
दूर..... से,
उमस…भरे, सागर बीच से,
पलकों पर वाष्पकण, ले..लेकर…
इनके लिए, श्रम-वर्षा लाए,
क्या ये कभी याद...करते है उन्हें?
जय प्रकाश मिश्र
भाव: संसार में कुछ लोग सच्चाई के लिए, अच्छाई के लिए, दुनियां को सुंदर, सुखद, और आसान बनाने के लिए, मूल्यों की स्थापना के लिए अपना जीवन दे देते हैं, पर हम शायद ही कभी उनके प्रति कृतज्ञता अनुभव करते है। हम लोग बस अपने लाभ और परिवार तक सीमित रहते हैं उनके उद्देश्यों के लिए किए गए कार्यों को आगे नहीं बढ़ा पाते।
पंक्तिकुल द्वितीय: अंतर कहां है!
उधार की..
टूटी सी बाइसकील.. उसकी
और ये... लंबी गाड़ी.. अपनी,
पर! रास्ता, कायनात.., लोग और बगिया
सब कुछ दोनों के लिए,
वही हैं, बिल्कुल वही...।
जो उसको मिले,
वही मुझको मिले..
किसी ने भी
मुझ, लंबी गाड़ी वाले के लिए,
एक भी कपड़े, नहीं बदले।
अब भी, वैसे ही चलानी होती है..
बाईसकील..,
चलाना, भर जाना,
भीगा लेना, अंगिया अपनी
पर जिंदादिल हो, निडर हो,
सामना करना.., लोगों से रूबरू होना
आगे बढ़ना, बेशक बहुत धीमें धीमें
कितना अच्छा लगता है, बनिस्पत...
इस... बड़ी गाड़ी में...
मुर्दानगी में... बैठे रहना, डरना...,
काठ का उल्लू हो कोई
कुछ ऐसे.. निगाहें फेरना,
परिवेश से अलग रहना..
क्या मिलता है, कुछ दिनों बाद
एक लंबी बीमारी...
इससे तो साइकिल ही ठीक थी अपनी,
सदा के लिए।
जयप्रकाश मिश्र
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