गांव की यादें।

एक गांव 

मेरे मन में है...

जिया था कभी.., 

बचपन में, लड़कपन में सही..

कुछ, यादें.. हैं बची, बहुत थोड़ी

सपना ही है अब सारा कुछ

वो लोग, वो पेड़, वो रिश्ते

आज तो वहां, कुछ 

है, ही नहीं।


गांव गया मैं, एक दिन भाई

याद पुरानी.... सारी.. आई,

कैसे.. कैसे... रहते थे... तब

गईया.. बैला.. रखते थे, तब।


भूषवा का घर होता था तब..

बांस बखरिया बनता था तब..

रंहठा थूंन्हीं गाडि बांधि के..

जौ गोहूं हम रखते.. भीतर...।


आम गाडि के भूषा अंदर... 

पकने खातिर रखते थे हम..

गुरअंचरा कै फांकी खाकर..

ठंडा इनार* जल पीते थे तब..।


दही मेलि, कच-रसवा.. पीते,

चना-केराव.. घुघुरी पै रीते

अरहरिया कै छिमियां चुसिचुसि

जाड़ा कै... दुपहरिया.... बीतै।


पीय धोनारी... पढ़ा थे करते

आलू गुछि अरहर कै डांठी 

मडियत गुड में डाला करते,

चना मटर कै होरहा भुजि भुजि

मुंह काला, हम किया थे करते।


खेत खेतारी, भरि.. दुपहरिया

पढि-लौटत... स्कूल की बेरिया

ककरी.. खरबूजा... तरबूजा

दुई नंबर.... कै लेइ बहाना...

झोरा... में चुप... भरा थे करते।


दौड़ावैं जब भगत.. गांव से

चंपत हम सब हुई जाते थे।

ओर-हनवा जब आवै घर तब

मुंह लटकाइ... बैठ जाते.. थे।


कैसे कैसे यंत्र वहां... थे

बरहा, अखनी कूंड, कराहा, 

ढेंकुलि, ढरका, दौरी, हाथा

लकड़ जुआठा, खखरा, मौनी

नाधा, जाबा.., छाना, छनहीं।


हरा..,नौहरा, फार, हरिसिया,

हेँगा, गंडसा, रेती, हंसुआ, 

मड़ई भीतर खोंसे रखते। 

भाला, बल्लम, लाठी, बरछा, 

पैना, सोटा, मुडल कुबरिया,

दादा लै लै, चला थे करते।


तेकुआ, तकली, चरखा, पूनी 

कच्ची रुई, सुतली, बधवा, 

तीसी, तिल्ली, मडुआ, मकुनी 

जड़हन, सांवां, भदइं, केरैइया 

गोजई, जौ कै होय मड़ैया, 

दवंरी चलय चढल दुपहरिया।


कवन कवन पकवान थे बनते

दोहथी, जाऊरि, मुच्छी, भौरी 

चोखा, गुर गुझिया औ ठोकुआ

आउरि-जाऊरि, महीर, गुलगुला

आमझोर्रा, सतुआ औ..पंतुआ।


पना, औ पन्ना कच्ची इमली, 

राई, मूली, उम्मी, छिम्मी 

हरी मटरिया पपटा वाली..

गेहूं, जौ,  गदराई.. बाली।

मिर्च हरी, धनिया, के साथै.. 

खोटल साग मटरवा ताज़ै.. 

होरहा भूजल, साग सपहिता,

तीसी, तिल्ली, लाटा, महुआ।

दाना भूजा भुजि भर्साईयाँ 

भरल चंगेरी भुजवाया करते।



पारी.. पारी... गुड बनता था

पूरे दिन... कोल्हू चलता था

भरि कराह जब रस होता था

तबै कोल्हार... बंद होता था।


पतई लै खोइया के साथे

बात बतकही करते करते

पूरी रात झुंकाई.... होती 

भिन्सहरा ले... बैठि बंधुओं.. 

भेली हम.. बांधा करते..।


दुसरा ताव चढ़ा के ओहि-पर

माड़ी महिया मारा करते।

पीय धोनारी चहवा वाली 

भिन्सहरा तक जागा करते।

पूस कै जाड़ा भैया हम सब

ऐसे ही...तब. काटा करते..।


कचरसवा कै स्वाद अलग था,

कहतरिया कै भाव अलग था

भेली, सोंईठऊरा, औ पीठा, 

गुरअँचरा कै राज गजब था।

महियल गुड में पाकल आलू

भैया ओकर स्वाद अजब था।


पीय... धोनारी, पढ़ा थे करते

राति.. राति.., जागा थे करते।

लिट्टी, बाटी, जाऊरि, घुघुरी, 

छनूई, भौरी, दलभरूई पूरी, 

दोहथी, हथपोइया कै रोटी, 

हरियर चटनी, लहसुन वाली

अमचूर, अमहर, ओहि में डारी

रिंकवचि, बैंगनि, बेसनि बारी

चना निमोना, सांवा खीर

जब तब हम खाया करते थे।


बरा, बरी औ कढ़ी, सपहिता 

सजाव-दही भरि भरि कहिरौता,

जोंन्हंरी, भुट्टा, फूट, कैइतीया,

ऋतुफल हम खाया करते थे।


मेला जाते...भोंपू लाते.. 

भोंपू बजा बजा घर आते

सुथनी खाते.. छील छिल कर

सोंधी चोटहिया जलेबी खाते

खुशी खुशी हम घर थे जाते।

जय प्रकाश मिश्र

शब्दों के अर्थ

इनार... कुआं 










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