रूप.. स्वर में.. बदलता.. मैं देखता हूं

पृष्ठ भूमि: संसार स्मृतियों का खेल है। स्मृति ही बुद्धि, अनुभव और कुशलता को धार देती है साथ साथ सुंदर पिछली यादों को, अपने घरौंदे में जिंदा रखती है। शरीर के शिथिल होने पर यह आपके लिए ऊर्जा बनती हैं। वेद वाक्य है निर्बल और अंत समय में अपने किए गए अच्छे कार्यों को बार बार याद करो अपने अच्छे व्यवहारों को याद करो और प्रसन्न रहो। इसी पर कुछ अटपटे शब्द भेंट करता हूं। उद्देश्य मात्र, आपका आनंद हो यही तक सीमित नहीं है।

क्षर गया है.. 

पृष्ठ,.. तेरे चित्र का..

आधार.. था जो, तूलिका..सी 

दृष्टि... का 

मन के पटल पर.., खिंचा था..

बना.. था, साथ.. थे हम..

अरसों.. पहले, 

बार पहले..! 

महकता.. चंदन सदृश..एक मूर्ति सा।

भाव: समय के साथ आंखे या दृष्टि रंगो की कूंची बन कर कुछ अच्छे दृश्य मानस पटल पर अंकित करती रहती है जो बहुत दिनों तक बनी रहती हैं। पर मिटना समय का रूप है हल्का भी होता रहता है फिर भी स्मृति में मिटते मिटते भी विशेष चीजें बची ही रहती हैं।

गल गया है.. 

पात पीपल.. की तरह..यह 

झड़.. गया है, 

बीच से खाली.. हुआ है..

छिद्रित हुआ है..

संजाल केवल सूत्र का, अब बच रहा है।


समय का दुष्चक्र है यह 

या, स्मृति को दोष दूं…जब कभी 

एकांत में.. तस्वीर! 

'तेरी' देखता हूं…, 

सच में सच्ची.. कह रहा हूं

अब! यह पा!..र दर्शी… हो गई है।

झिलमिलाती..आकाश की इस 

कालिमा में

तारागणों सी बच रही है। 

भाव: जैसे पत्ते गिरते हैं, सड़ते हैं और एक जाली का प्रारूप बन जाते हैं रेशों का कंकाल, वैसे ही स्मृतियों के चित्र भी बदलते रहते हैं। कुछ समय से धूमिल और कुछ स्वास्थ्य से अवांछित। जैसे बादलों में या तारो में हम आंतरिक अनुमान या सोची हुई आकृति देखने लगते है वैसे ही स्मृति में भी घटनाएं और लोग अपने किरदारों को लेकर कही न कही धूसरित ही हो, जिंदा बने रहते हैं।

पर, रंग! 

रंग वैसे के ही वैसे आज भी, अनुपम सजे..हैं!  

एक दूसरे संग.. कुनमुनाते, झिलमिलाते.. 

आज भी वे.. झांकते है..।

मत समझना, तनिक भी 

वे आज तक धूमिल.. हुए हैं।

जानते हो क्यों? 

अरे! मन में बने थे, 

इसलिए वे आज भी मन से, जुड़े हैं।


चटख.. 

कोई एक धारी…

दृष्टि के उस तूलिका की

दी.....खती है.. 

आ.....ज भी जब अलग.. होकर.. 

चित्र से…!

कुछ चाहती है बोलना.. 

रंग ले..., उठती हुई! 

सुनहले बिच श्याम होती, उग रही.. 

उस रेख…सी.. 

जो, स्याह.. होती, बहुत धीमी..

बार पहली..होष्ठ ऊपर… 

नवकुंआरे… के मुखों पर…

भींनती… है, रस लिए वह

नवरसे… का, क्या कहूं! बस..

समझ तूं... सब ।


भाँपती संदेश... कोई भीतरी..., 

स्नेह के वश, मुखर होती.. कह रही है..

आ रहा है.., आने को है…

कोइ..पहली बार 

जैसे भावना उद्दाम की...

ठीक वैसे, जैसे जब हम मिले थे... 

बार पहली।

कुछ हुआ था.. कुछ.. कुछ.. हुआ था! 

भाव वो ही भेजती है अंग में..

बिजली सरीखी कौंधती है

तड़कती है, नाड़ियों में।

समझ तूं सब।


हाथ मेरे शिथिल… हों, कितने मगर..

रस…. डोलता है 

आत्मा भी भीगती… है,

पारदर्शी ही सही, तसबीर 

तेरी देखकर।

क्षरित हो कितनी, तो क्या, 

पुराने चावलों सी, आज भी कमरे में मेरे 

महकती है।


तस्वीर तेरी 

आज भी, कितनी ग़लित हो; 

जर्जरित हो, पारदर्शी शून्य ही हो! 

स्पर्श से भी हीन हो.. 

पर संगीत कोई बज रहा है, 

पृष्ठ में उन..जर्जरित रेशों के नीचे... 

बीच.. से, 

मै सुन.. रहा हूँ 

आधार वह हि, बन रहा है, आज फिर से..

खिंच रही है लो, पुनः यह तूलिका... 

स्वर के सुरों का-धान लेकर

उठ रहीं, अन्तस में मेरे।


लय ताल में वे बंध रही हैं

नभ नीलिमा का 

पट लिए वह उतरती है, जेहन में...

रंग, उसके, हाय! कैसे..

ध्वनि मधुर बन.. बह.. रहे हैं।

रूप.. स्वर में.. बदलता.. मैं देखता हूं

पास से प्रिय, 

अनोखी यह रीत पहली बार, सच मैं देखता हूँ।


प्रिय हैं मुझे, 

यह रूप, स्वर सब कुछ तुम्हारा

क्या करूं! मै,

इन्हें देखता, सुनता कभी, एकांत में

तुमसे मिला हूं..

जब कभी मुझे कभी नीद आती है नहीं 

किसी रात में।

जय प्रकाश मिश्र







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