दर्द मेरा! कोई तो सुने!

पृष्ठ भूमि: समाज में अनेक समस्याएं बनी रहती हैं और तीव्र विकास के युग में बदलती तकनीक के उपयोग से निर्मित ऑटोमैटिक मशीनों ने जो अपने समय के धुरंधर कारीगर, मिस्त्री, मैकेनिक, घरेलू सामान बनाने वाले कुम्हार, नाई, सिलाई गर, अनेकों के सामने रोजी रोटी की समस्या पैदा कर दी है। उनके प्रतिस्थानी विकल्प पूंजीवादी व्यवस्था ने बहुत तेजी से पैदा कर लिया है। ऑफिस में पुराने बाबू कंप्यूटरों से सदमे में हैं, टाइपिस्ट की जरूरत खत्म, कागज नहीं चाहिए, सैनिकों के पुराने दम खम की वैल्यू ड्रोन और मिसाइल के आगे उतनी नहीं। सब बदल रहा है रातोरात। इन सबकी पीड़ा का एक आरेख प्रस्तुत है आप मात्र आनंद ले मकसद इतना ही है।

दो लाइने: अपनी बात

क्या जरूरी है ?  

गुजरो जहां से, 

लाल कर जाओ...

ये नाकाफी है! क्या...? 

जिससे मिलो.. , 

थोड़ा सुकूं.. उसमे.. भरो।

कविता:  दर्द मेरा

एक दर्द.. है, एक वर्ग.. का 

भीतर ही भीतर.. गूंजता है,

रास्ता पाता.. नहीं.. 

तो.. फूट कर, यह बह... रहा है।

लो बह रहा है...।


काबिल है, 

उतना आज भी, 

जितना बनाया था कभी

चढ़ती उमर में..आपने 

सपने बुनाए थे कभी।


वो..

उस पेड़ पर! 

इस उम्र में, कैसे चढ़े,

उसके समय, 

ये पेड़, तब तो, थे नहीं,

बस इसलिए ये, राज ये सीखा नहीं।

एक डर संजोए जी रहा है! 

क्या करे? कैसे करे! 

तब कह रहा है आपसे मेरी सुनो

जरा गौर से..


'कुछ टूट जाता है मेरा'

कैसे कहूं, मैं...

तूं समझ तो..

तूं बड़ा है..

सब बिखर जाता..है मेरा 

सच! मान तो.... 

जो जो संजोया ब्रती बन.. 

जीवन में मैने..

थिर किया, 

शामोसुबह का नाश्ता..निश्चित किया..

रास्ता अब यह.. चलूंगा, 

उम्र ये कट जाएगी.. 

मैं..

सब्र से जीवन जीऊंगा,

जिंदगी कट.. जाएगी।


पर बैठ... भी पाया नहीं.. 

मैं देखता... हूं! रात भर में…

कुछ नया!  

तुमने... किया है!  

मेरे लिए विप्लव... किया है।

तुम! 

बहुत आगे... बढ़ गए हो..

नेपथ्य में... मैं! 

आ गया हूं! 

दृष्टि से ओझल हुआ हूं! 


कहां जाऊं, क्या करूं…!  

इस मशीनी छांव से..

इस रुपहले दांव से.. 

सच कह रहा हूं! 

मैं डर... गया हूं।

मुझे लग रहा है! मैं... मर गया हूं! 


क्या सोचते हो तुम कभी.. .

आज! अब! इस हाल में! 

मैं… क्या करूंगा..! 

पेट है.. संग 

चार मेरे, हाय 

बच्चों, पत्नियों के!  

मैं इन्हें!  कैसे भरूंगा! 


बस मुनाफा.. बढ़ चले, 

चिंता है तेरी..

साथ के सब, छूट जाएं, 

मर खपें, भूखों मरे, 

दायित्व तेरा कुछ नहीं…:! 


क्या वे दिन थे.

जब साथ मिलजुल हम लड़े थे,

एक दूसरे के, संग चले थे..

पार कर, दुर्स्थिति को..

साथ ही आगे बढ़े थे..

एक संग हम सब जिए थे।


वे ही हैं हम! 

आदमी हैं, आज भी.. हैं

कुछ मेरी.. सुनो तो.. 

कुछ टूट... जाता है मेरा, 

दिल टूट... जाता है मेरा..

कैसे कहूं, मैं..., तूं समझ..! 

सब बिखर जाता..है मेरा..

'घर' बिखर... जाता है मेरा..।


सच सुन! मेरा... ।

कुछ कर मेरा...! 

अरे! अब तो, कुछ कर मेरा! 

क्या चाहता है.. तूं बता ? 

आग का सेवन करूं मैं! 

सभी को ले साथ मैं 

इसी में ही जल मरूं मैं, या 

जलाऊं जगत सारा, क्या करूं मैं? 

जय प्रकाश मिश्र


Comments

Post a Comment

Popular posts from this blog

मेरी, छोटी… सी, बेटी बड़ी हो गई.. जब वो.. पर्दे से

पेंशन बिन जिंदगी, मेरी ये खाली हो गई है।

चलो पेरिस की एक शाम से मिलें!