नाराज मत हो, मुस्कुरा
ऐ! मेरे मन!
नाराज मत हो! मुस्कुरा!
फंस गया!
किसमे तूं आकर!
बेर के कांटे हैं, ये!
गौर से,
तूं! देख तो!
प्रिय से नुकीले!
घने, छोटे,
हर डालियों में
सट के बैठे!
घात से थे,
पर
नहीं गिरने ये देंगे,
और आगे
फिर कभी अब
आगे तुझको।
थाम लेंगे, पकड़ लेंगे;
आंचलों में!
कंटकों संग ही बने हों, चाहे जितने।
क्या करें वे!
पास उनके हैं वही तो!
पर याद रख!
वे भरेंगे दिल में तुझको,
जमीं पर...
गिरने न देंगे।
आगे या नीचे.. और पीछे..
अब कहीं, हिलने न देंगे।
नाराज हो, ...मत!
मुस्कुरा!
प्रेम के कांटे है ये
तुमको उठा कर देख तो ये चूम लेंगे।
जय प्रकाश मिश्र
हर आदमी में
कुछ तो है,
बहता है जो...., हर वक्त
मौका मिला तो.... कह उठा,
निकल के.... वाह! वाह!
जय प्रकाश मिश्र
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