एक नदी थी ’सिंधु’ बहने सात थीं
शीर्षक: अपने देश की नाम
एक नदी थी ’सिंधु’,
बहने सात थीं
सप्तसैंधव नाम था
जगत में विख्यात थीं।
जीवन प्रणाली हिंद की थीं,
बहती हुई वह प्राण थीं।
इस भूमि पर बहतीं,
बनातीं, अमिट रेखा,
युग युगों से
हिंद की सीमा थी वे!
सीमांत थी!
भारत यहां तक!
बोलतीं वे! आदि से
हर भारती को,
स्नेह जल से सींचतीं थीं
खेत सारे भारती के,
दुश्मनों का काल थीं।
कुछ कबीले पार थे
ईरानी वहीं पर
बोलते थे फारसी में
स को ह वो
बस कर दिया और कह दिया
सिंधु को यूं हिंदु उनने।
कुछ इस तरह
जो रह रहे इसपार थे
हिंदू हुए,
फिर बाद में स्थान से जुड़ते जुड़ाते
आज हम इस पार सब
हिंदु स्थानी से आगे हिंदुस्तानी हुए।
नाम हिंदुस्तान इस देश का
कुछ पड़ा ऐसे।
एक नदी थी
हिम भरी थी
हिमनद हुई
बदलती यह काल क्रम की
भट्ठियों में
देखते ही देखते हिन्नद हुई
कुछ कबीले तीर पर
बसते थे इसके
बहुत दिन से
कुछ दिनों के बाद उनको लोग
हिन्नदू कहने लगे
आज वे ही सब यहां हिंदू हुए।
फिर सुनो क्या क्या हुआ!
आगे वहीं पर!
कुछ ग्रीक आए,
और थोड़ी दूर उनसे बस गए
गायब किया ह, द को किया ड
और बोले इंडु इसको
हम रह रहे इस पार
हमे इंडोज बोले
कुछ इस तरह हम
इंडिया तक आ गए
कुछ के लिए आज हम हिंदुस्तानी
कुछ के लिए इंडियन हैं बन गए।
जय प्रकाश मिश्र
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