यह कुछ नहीं ही, प्रेम है, विश्वास में,
मैं खड़ा
एक बिंदु पर था
सृष्टि में
बहुत छोटे, एक कोने
देखता और सोचता!
सृष्टि क्या है?
और कैसे चल रही है?
भेदने की कोशिशों में….
गूथता था, मनके सारे, (beads)
चमकते…हिलते हुए…
हर क्षण बदलते!
रंग, द्युति, आकार..! लेते..
छोड़ते!
नेत्र भीतर बन रही
छाया हों कोई…
बदलती किसी दृष्टि में,
इस सृष्टि के।
प्रश्न था?
पर जटिल था!
मैं अडिग था।
कुछ तो होगा, कहीं होगा?
खोजता हूं, डूबता हूं!
आज फिर एकबार
चल इस सृष्टि की
गहरी तली में हेरता हूं।
डूबता मैं
जा रहा था
देखते ही रुक गया,
वह शकुंतला थी,
दुष्यंत से जाने न कितनी बार
झुक झुक…
पास से कुछ कह रही थी।
पहचानते हो नहीं मुझको?
इस भरत को!
पुत्र तेरा है! तेरी मैं भार्या हूं!
इनकार करते हो,
तुम इतनी बार!
तो.. लो..
अब.. सुनो!
मैं पूछती हूं! आदि के सर्वोच्च से!
बस! सुनो!
तुम सोचते हो…
मैं अकेली थी वहां.. और
मात्र… तुम थे!
एक वृद्ध था!
तुमने और मुझमें..
उस समय भी..शांति से बैठा हुआ
सब देखता, पर चुप पड़ा था।
नहीं जानते हो! तुम उसे!
वह आदि से लेकर अभी तक
हर जगह सबमें छुपा है!
जानता है सब, मगर वह तौलता है
हर समय तुमको यहां पर।
उससे कहो, तुम सत्य हो!
मैं मान लूंगी,
एक क्षण न यहां रुकूंगी।
वह सत्यता थी, विश्वास था,
तुल गया जीवन जहां था।
यहीं था,
वह मूल, जिस पर सब टिका है।
शेष सारा
शूल जिस पर सब टंगा है,
झूलता है, शूलता है,
रातदिन यह बढ़ रहा है।
पूछ बैठा खुद से मैं,
मुझको बताओ
सत्य क्या है?
सत्यता क्या सत्य है या और कुछ है?
विश्वास क्या है?
उत्तर मिला!
तुम ही बताओ
विश्वास का आधार क्या है?
सत्य है,
या और है कुछ!
यदि सत्य, की ही, परणिति विश्वास है..
तो सत्य में विश्वास में,
फिर फर्क क्या है?
कुछ नहीं,
यह कुछ नहीं, ही
प्रेम है, विश्वास में, उस सत्य से।
इसको समझ तो।
फिर सत्यता में क्या छुपा है?
वह बताओ!
सत्यता सद्गुण है सारा!
हर वस्तु का आधार है
जगत का स्वामी यही है
विश्व का आधार है,
सत्यता ऊंची है सबसे
शेष सब बेकार है।
जय प्रकाश मिश्र
Comments
Post a Comment