बन, बगिया में बैठी वो.. कौन है अकेली,
बन, बगिया में बैठी
वौ.. कौन है अकेली,
झुरमुटिया में.. खेलै,
नदी.. नालों..संग डोलै।
पेडवा..के.. फुनगिन..,
बइठि.. झूमैय..अकेलै..।
संग.. बनरा के.. कूदै..
मोर पंखिंह.. चढि झू लै।
धूप.. छैयां... चढ़ि.. दौरै,
बोलि...मैना की......बोलै।
भाव: प्रकृति की देवी निःसंग अकेले बन बागों में अपनी स्वच्छंदता में मग्न है। वनस्पतियों, जीव, जंतुओं के साथ अन्यान्य क्रिया करती आनंद विभोर हो, पश्चातापी क्रीडा कर रही है।
जुटहनियां जब डो लैं
पुरवैया..... पाई बोलैं,
मोरनियां बनि.... नाचै
अगहनियां धान रांचइ।
भाव: अगहनियां धान साठ दिन में पैदा होता है देवी पूजा में विशेष रूप से चढ़ाया जाता है। वही देवी मां प्रकृति अठखेलियां करती प्रसन्न होने की कामना में डूबी हैं।
पाय! एक दिन अकेले!
गही बंहिया मोरि धीरे,
चल आज मोरी ठैंयां,
तूं लागत है जूं कन्हैया।
भाव: एक दिन मुझे अकेले पाकर उस देवी ने मेरी बांह पकड़ अपने घर ले गई और बोली तुम तो मुझे कृष्ण कन्हैया सा दिखता है।
मैं समझ नहीं पाया,
मैं किसके हाथ आया।
वह बोलिं मुसुकाती
मोहे थोड़ा समझातीं।
भाव: मैं अचकचा गया, ये कौन हैं मैं समझता उसके पहले ही वह मुस्कुरा कर समझाते हुए बोलीं।
तूं तो राजा बेटा मेरा!
तुझे, राजा बना था भेजा!
इतनी बड़ी! रियासत!
हरियाली! तुझे दी थी!
पशु पक्षी भी दिए थे,
नदी नाले सब दिए थे!
ये क्या किया है? तूने!
भाव: उन्होंने प्यार से कहा आदमी तो ईश्वर का बेटा ही है, उसी का अंश है। उसके लिए ही उसने सारी कायनात यह सुंदर दुनियां बनाई थी। लेकिन ये मनुष्यों ने यहां क्या कर डाला।
सारा खाक! किया है तूने!
महक दी थी जाफरानी!
रंग रूप आसमानी!
प्रेम की दिवानी
केशर भरी जवानी!
क्या क्या दिया था तुमको!
तुम ही बताओ मुझको?
भाव: उस देवी ने अपनी व्यथा स्पष्ट बयान करना शुरू कर दिया। मनुष्यों ने मिलकर सबकुछ खाक, नष्ट कर डाला। ईश्वर ने अपनी करुणा और प्रेम के चलते उसे अपनी बेहतरीन चीजों से नवाजा था।
ये क्या किया है तूने!
अरमान मेरे छीने!
बारूद महकता है....
दिल मेरा टूटता है..
देख!.. कैसे, कैसे
हाय! अबोध बच्चा.. मेरा! ऐसे
करतबों से तेरे
मरने के आज पहले!
तड़पता है कैसे!
भाव: तुम्हारे लोगों ने मानवता को शर्मसार कर दिया। बच्चे अनाथ, स्त्रियां अनाथ, बीमार बूढ़े सब अनाथ! जंग आदमी और आदमी के बीच ऐसी जिसमे शिशु अबोध तड़प कर मर रहे हैं। बारूद की लाशों की दुर्गंध चारो ओर भर गई है।
लाशे बिछी हुई हैं!
तलवारें तनी हुई हैं!
सूखती ये नदियां!
झुलसतीं ये वनस्पतियां
सारी कहानी तेरी
चिल्ला के कह रही हैं।
भाव: दुनिया की बदली हुई हालात मनुष्य का पूरा चेहरा जो क्रूरतम है खुद ही बेनकाब हो चुका है। आपसी विद्वेष, स्वार्थ की नंगी मांग, अंधी सोच की कहानी बयां कर रही है।
ये क्या हुआ है,
तुझको!
दिखता नहीं है,
तुझको!
ममता भरी मैं मां, थी
अब बूढ़ी हो गई हूं!
देखकर के तुझको
शर्मिंदा हो गई हूं!
भाव: अपने बच्चों का ऐसा हाल देखती में खुद में शर्मिंदा हूं। मैं सब देख अब बूढ़ी मन वाली हो आत्म निंदा में डूब रही हूं।
मैं बांझ ही जो होती
पर खुश तो आज होती।
भाव: ऐसे पूतों से तो निपूती ही मैं अच्छी होती। आत्मग्लानि तो नहीं होती।
पर! तूं....!
तूं....! बेटा मेरा है,
हर चीज में बड़ा है।
मेरी गलतियां कहां हैं?
मैं मुंह दिखाऊं कैसे!
धरती हूं, ये धरा हूं!
मैं भाग कहां जाऊं!
तुम्हें ले कहां समाऊँ!
भाव: मैं भी एक समाज में ब्रह्मांड में रहती हूं, सब मुझे धिक्कारते हैं। हेय मानते हैं। शर्म से मुंह छिपाती अंधेरे में बैठी रहती हूं। कहां ले तुम सबको समा जाऊं की मेरी तुम सभी से मुक्ति मिले।
ब्रह्मांड देखता है,
नक्षत्र देखते हैं।
सूरज बुझा बुझा है
तारे छिपे छिपे हैं।
अकेले में घूमती हूं,
छुप छाया में बैठती हूं
इज्जत बचाऊं कैसे
दिनरात सोचती हूं।
बन बाग में अकेले
मैं ही तो बैठती हूं!
करतबों पे तेरे
शर्मसार हो चुकी हूं।
मैं मां हूं, तुम सभी की
इसीलिए, तो बैठी
किससे कहूं मै कबसे
रोती बिलख रही हूं।
आज देखा तुमको
तो खुश मैं हो गई हूं
तूं राजा बेटा मेरा
तूं नेक बन अभी से।
भाई बहन ये तेरे
जितने यहां खड़े हैं,
तूं खेल चाहे जिससे
सारे तेरे लिए हैं।
जय प्रकाश मिश्र
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