तुम फिर आना! तुम्हारा अपना घर है!
घुमावदार, बदलती
इच्छाएं तो
झरनों, नदियों, पनालों
तेज धारों में सिमटती
जल धाराओं की ख्वाइशों
में शुमार होती हैं।
बहाव है तो
ख्वाईशें हैं।
बहती जिन्दगी हो! या पानी!
हम सबकी... एक ही कहानी।
सब, बातें वही,
वैसे ही, उछलना,
कूदना,
चलते चलते, बहना
गीत गाना,
धीमे धीमे गुनगुनाना।
कभी कभी, कुछ बातों पर
भीतर से सीजना!
फिर आंखे नम!
आंसू निकल आना।
जीवन तो, गति में ही है।
और गति...
एक विशिष्ट ऊर्जा है।
ऊर्जा है, तो साथ कोई न कोई
परिवर्तन भी है
परिवर्तन है, तो
कर्म और परिणाम,
परिणाम है तो आनंद और…
सुख दुख, सुबह शाम।
लेकिन सुना है
जीवन में शांति भी
आनंद और सुख ही लाती है।
इतना ही नहीं दुख को दुराती है।
सोचा एक दिन
क्यों न आज
बच्चों जैसी कुछ
कारगुजारी कर गुजरूं,
जब घर के सब सो जांय
अकेले में शांति और कर्म का
काकटेल बनाऊं, फिर बैठ
आनंद में भरपेट पियूं।
फिर क्या था!
पहला परिणाम आया!
सच कहूं!
मैं हुआ, बहुत खुश!
अभी तो कुछ हुआ भी नहीं,
पर यार! भीतर से
प्रसन्नता सी बरसने लगी!
भीतर मेरे, धीमी रोशनी लिए,
मोमबत्तियां भी जलने लगीं।
फिर रात होनी थी,
हुई,
पहले गहराई,
फिर गाढ़ी भी हुई।
मैं... उठा,
शांति से उठा!
कर्म और शांति पर...
चुप चुप.. सोचने लगा।
खयाल आया,
चलो अच्छे से... बैठते हैं
पहले पीठ सीधी कर तब कुछ
शांति से,
“इस शांति” पर सोचते हैं।
बैठा रहा शांति से,
आंखे बंद,
भीतर से सजग, जागता,
शांति में निरंतर
प्रयत्न से, झांकता।
थोड़ा समय लगा
झिंगुरों की आ रही
निरंतर
सांय सांय की आवाज
को भेदने में,
उसके पीछे छुपे, अनोखे
प्रियतर पृष्ठ तक
जा पहुंचने में।
अद्भुत!
यह क्या था!
यहां सब कुछ एक!
सफेद राख!
निष्क्रिय, विहीन!
इतनी रंगीन दुनियां की!
ऐसी पृष्ठभूमि!
निष्प्रकंपित!
निश्चल!
शांत!
कपोत के पंख सी..
मटमैली...,कातर,
सबकुछ को जिंदा समेटती,
पूर्णतः अपने भीतर।
दुनियां की सारी, क्लांति
को भस्म का तिलक करती
इतनी शांत, शांति।
वह पाषाण के
अगम चोटियों सी
सभी आवाजों को खा जाती थी।
सारे कर्म, परिणाम,
धूसर धूसर थे,
राख नहीं,
किसी छाया की
स्यामता के भीतर थे।
इतना बड़ा पट!
डर गया!
सोचा भागूं
अभी झटपट!
तभी! फुसफुसाती!
आवाज आई।
मेरे बच्चे! भाग कर
कहां जाओगे!
इस जगह के सिवा
सब जगह अशांति ही पाओगे।
तुम धन्य हो,
यहां आए,
यहां का रास्ता
अपने प्रयत्नों से
खोज पाए!
अब जब यहां से
उस दुनियां में जाओगे
देखना! तुम कितना!
पछताओगे।
यही है! वह
कर्म और परिणाम का
सच्चा कॉकटेल,
जिसे ध्यान, समाधि, और वे सारे
जाने क्या क्या नाम देते हैं।
तुम फिर आना!
तुम्हारा अपना घर है!
शांति सागर के सुख में समाना।
ध्यान अचानक टूटा!
मैं क्या कहूं, मैं तो धन्य हो गया।
तुम भी, अपने से अपना कोई,
काकटैल बनाना,
अकेले में बैठ कभी रात में
एक बार जरूर पीना।
फिर अच्छे से
अपने भीतर की मुस्कान देखना!
और बाहर भी मुस्कुराना!
जय प्रकाश मिश्र
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