पर अभी कोई नाम इसका इस धरा पर किसी ने रखा नहीं था
कोई सो रहा था गोद में
पर अनजान था,
उस गोद से,
उस जगह
से, उस
लोक
से।
शांत
कितना, क्या
कहूं, पर झांकता सा
ईद का ही चांद मुझको,लग रहा था।
मुंह तो उसका दिख रहा था
पर नहीं पूरा बना था।
अभी तो वह बन
रहा था,आज
भी जब
देखा है
मैने
एक
छाया
स्नेह की
सोई
हुई
थी।
पर नहीं
पहचान कोई
साथ थी, उसके यहां
मैं खोजता ही रह गया था।
पर
कहां
पहचानता
वो था मुझे और
मैं उसे,आज से पहले
नहीं हम थे मिले
इस रूप में
इस धरा
पर,
पहले
अकेले।
कैसे बुलाता?
क्या आवाज देता!
वो धरा पर थी कहां, जो सुन
ही पाती, बेखबर थी!
चिद में लय थी!
दूर हम सबसे
अलग थी।
पर उसे
मैं
देखकर
ही खुश बहुत था।
अस्तित्व है
आस है
यह
हम सभी
की प्यास है।
जिंदगी की प्रथम सीढी
आज मेरे पास है।
आगाज़े जिंदगी,
जैस्मीन की बिखरती
मीठी खुशुबू थी।
झक सफेद
अद्भुत खिलती हुई सी,
एक लड़ी
आंखें खोलती ,
मेरे पास पड़ी थी।
आंखे बंद थीं
मेरी…,
मैं….,
स्वप्न के
आगोश में था।
रात्रि में…
खिलता हुआ
कोई फूल…
मैंने कभी
देखा नहीं था।
‘मूक’ था, मैं,
‘मौन’
मेरे
पास ही
बैठा हुआ था।
चांदनी….
किस ओर
जाने देखती.. थी,
चांद…तो
सहमा हुआ
नीचे पड़ा था।
क्या हुआ,
मैं क्या कहूं!
एक बेल छोटी,
थोड़ी लम्बी,
आ गई
सपने के भीतर।
सांवली…
शायद वो
कुछ थी,
कलियां लगी थीं
आंखुरों पर।
खिलने लगीं
मेरे सामने,
मैं, देखता
बस चुप
खड़ा था।
दूधिया हंसी
हंसने लगीं,
किलकारियां
करने लगीं
मैं घुल गया
उन परिमलों
की गंध संग
आकंठ, अन्तस
स्वत्व में
डूबा हुआ सा।
पर अभी
कोई नाम इसका
इस धरा पर
किसी ने रखा नहीं था।
जय प्रकाश मिश्र
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