मनुज है यह, सभ्यता का ढोंग रचकर, देख कैसी जिंदगी, है बंदरों सी, जी रहा।

पुष्प प्रथम : नियति

देख तो, तेरे लिए 

उसने बनाए 

लोग कितने,

कैसी धरा यह, 

खिलखिलाती

झिलमिलाती

कुल-कुलाती 

नदी यह बहती हुई।


सरकती ऋतुएं बनाया

क्रमिक आतीं, क्रमिक जातीं

एक के पीछे लगीं एक। 

काल को 

नौकर बना 

तेरा यहां 

वह खुद बना 

साया तेरा

हर वक्त रहता 

साथ तेरे

पुष्प द्वितीय:  मानवता

ढीले करो 

धागे…. 

वो मन के

प्रेम… जिनमे 

पनपता…. है,

दूर… कर.. दो 

तंतु…. जिनमें

घृणा.. घुल कर 

घर.. बनाती।

तय करो!

लोग सारे एक होंगे, 

दुख सभी के एक होंगे।

एक ही वैभव सभी का 

सारे मानव एक होंगे।

तृतीय पुष्प: जिम्मेदारी

मेरी ड्यूटी… 
ही ऐसी.. थी 
तुझे ….
मैं.. भूल जाऊं।
मुझे तूं 
याद आए 
जब 
तुझे  "मैं"
भूल जाऊं।

चतुर्थ पुष्प:  आजकी कविता

सब सुखी हर ओर हैं
पर मनुज है.. घुट रहा,
जग सहज है चल रहा
मनुज ही क्यों दब रहा।

पवन के संग... पत्तियां 
हिल हिल हिलोरें ले रहीं
पर मानवी तो.. आज भी 
घर की दीवारें... ढो रही।

लहर पर लहरें उछलती 
कूदती हैं नदी....... पर,
पर आदमी.... वर्षात में 
छातों के नीचे चल रहा।

कूकती हैं....... कोयलें 
मधुमास में उस डाल पर,
मन जहां उनका है रमता 
कूदती उस डाल..... पर।

चादरें.. है....... जाति की 
घर देश और समाज की 
ओढ़कर इन.. चादरों को 
मानव है कितना घुट रहा।

मस्त कोंपल खेलती है
फुनगियों के.. शीर्ष पर,
बंधनों की बेड़ियों... में 
मुक्त जीवन... मर रहा।

मनुज है यह, 
सभ्यता का ढोंग 
रचकर,
देख कैसी 
जिंदगी, यह
बंदरों सी, जी रहा।
Jai prakash mishra 

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