स्वतंत्रता दिवस की बधाई।
एक देश था,
गुलाम था।
वो गुलाम !
कौन था?
देश की आग, हवा,
पानी,
धरती या आकाश
चिड़ियां, या वन, जंगल,
घाटियां या जानवर बे जुबान!
वो गुलाम,
जो थे,
क्या बेड़ियों में बंधे थे!
इतनों को बांधना
संभव था ?
किसी के लिए
वो बांध ले
रस्सियों में,
नहीं! नहीं
सच यही है।
राजा मात खाया
सब गुलाम हो गए।
आदमी और भेड़ में क्या अंतर!
लोगों ने
अपने को खुद ही
मान लिया,
हम अब गुलाम हो गए,
बेड़ियों में बंध गए।
जब उनका राजा
और उसके थोड़े से
सैनिक और घोड़े
युद्ध में मर गए।
उसके आगे
उन्हे आज तक
कुछ नही बताया गया
की अब उन राजा
और उन सैनिकों की मृत्यु बाद!
वे स्वतः राजा और सैनिक बन गए।
क्रमवार मिलकर, आगे
लड़ मरने के लिए।
नहीं तो क्या
वो भेंड़ हैं!
की जो उन्हें चार डंडा मारे
वो उसी के हो गए।
क्या यही देश है।
ध्यान रहे पराधीनता और
उसकी बेड़ियां सदा अदृश्य थीं
केवल उन देश वासियों ने
अपने से, अपने तन में
अपने मन से, बांधी थीं।
सामूहिक पराजय
मात्र
मानसिक दुर्बलता मन की हार,
और अपनी, केवल अपनी,
रक्षा की बात,
से ही शुरू
होती है।
सामूहिक पराजय कभी भी
वहां नहीं होती है,
जब और जहां
सब के साथ,
पूरे समाज
में जागृति
और आपस में बात होती है।
जब जिएंगे सभी,
जब रहेंगे सभी,
तो फिर लड़ेंगे सभी
क्यों नहीं, हथियारों से नहीं
तो कलम से, श्रम से, नंगे बदन से।
और जब लड़ेंगे सभी
तो कुछ तो मरेंगे भी।
देश के लिए!
जब आम आदमी उठेगा
तभी! सच!
यह देश बचेगा!
विडंबना यही है,
एक डर, एक भय,
तब भी था, आज भी है;
क्या कल भी रहेगा!
राज सत्ता का
फौज का,
सिपाही का
बल का, क्रूरता का
दरिंदगी का
असत्य के साथ शुरू होकर
सत्य के दर पर दम तोडता।
कुछ बड़े लोगो के
निहित, मरणधर्मा स्वार्थ पर
बलिदान होते रहेंगे मासूम! लाखो
सदियों पीछे से सदियों आगे तक!
शक्ति के पागलपन और
बुद्धिमानों की चालाकी से
ये भेंडें जब लड़ना सीखेंगी
तभी स्वतंत्रता इनका वरन करेगी।
भेंड डर, भय से हट
अपना रास्ता खुद बना
अन्याय से
एक बार नहीं, जब बार बार
लड़ती मरेंगी!
तभी वे अपनी भेंड़ सोच से
स्वतंत्र होंगी।
प्रतंत्रता क्या है?
कुछ लोगों की लालच के चलते
निरीह सीधे साधे लोगों का
उनके फैलाए
जाल में फंसना।
मानसिक रूप से उस
जाल को ओढ़ कर लंबे समय तक
चुपचाप अंधेरे में बैठना।
स्वतंत्रता एक दैवीय सुगंध है!
यह जीवन में भय की नदी
पार कर
आगे जाने पर ही.....
वास्तव में मिलती..... है।
जय प्रकाश मिश्र
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