सोचता हूं: कौन है,

सोचता हूं: कौन है,

संसार को….

जो भोगता…

पल छिन यहां है ?


सुख, मान कर 

जो है भरमता …,

अमराइयों की छांह में, 

निशि दिन बिचरता।

या…

विषय कोकिल, किलकती 

जब जब सुनाती तान अपनी

झूमता मन से बंधा 

बंधन में उसके

रात दिन जो।

या

रस बरसता सावनी का

प्रकृति का हिय हुलसता है,

मधु टपक जाता दृगों से 

सच बरसता है,

भीग कर उस मृदुल रस

जो नृत्य करता

पल पल यहां है।

या…

बोल मीठे बांधते हैं

मन को जिसके, 

बालकों, सुकुमारियों के 

मधुर मुख से

अमिय लेकर, तुष्ट होता।

या…

क्या वही

जो रस समाता

तान में उस,

गीत के अवधान से

जो उपजता है।

या…

क्या वही, जो है सयाना,

रस पत्थरों में ढूंढता 

पर विकल रहता,

जिंदगी भर।


यदि नहीं तो

कौन है वो, क्या वही… है,

छोड़ कर घर बार जो

अपना मृदुल परिवार जो

विचरता वन भूमि अंतर।

शांति लेकर हृदय भीतर।


पुलिन गंगा जमुन तट पर

मौन चादर ओढ़ कर जो

ध्यान की है धुनि रमाता।

शांत तन और शांत मन से

दुनियां में खुद को है समाता।


मुक्त जो है बंधनों से,

मुक्त है निज परिजनों से,

मुक्त है जो मुक्तता से

मुक्त है जो आत्मता से।

संयमित जीवन है जिसका

भ्रांति से जो दूर है,

क्या वही रस चख रहा है! 

जो रसों से दूर है! 

जय प्रकाश मिश्र









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