बसि रह्योव
देवता की इस
परम मनोहारी,
करुणामयि,
वरद,
कृपामयि,
दयालु,
तेजोमयि,
आभावित, प्रज्वल्यमान
पाषाण मूर्ति का
वह “कण” जो
संपूर्ण मूर्ति के
विशिष्टतम स्थल”
ललाट मध्य पर प्रतिष्ठित है।
संपूर्ण मूर्ति का हर तरह
वही तो निरा प्रतिनिधि है।
यह “कण”
देव मूर्ति की हृदय छाया रूप
“आंखों” से भी अधिक
महत्ता प्राप्त है।
जबकि उन निर्मल आंखों से
अविरल प्रवाहित निर्झरिनी
से उदार कृपा हर हर करती,
हर हृदय में निर्झर झरती रहती,
सर्वकाल सर्वहिय तुष्ट करती,
सतत दया वर्षण
करती रहती हैं,
पर यह ललाट का प्रदीपित
मध्य बिंदु उससे भी अधिक
“परम तेजवान” और विशिष्ट है।
मूर्ति की आंखों में देखते..
हम दुनियां को मांगते है,
ललाट की प्रदीप्ति के समक्ष
सभी नतमस्तक हो
आत्मसमर्पण कर
आत्मलय होते हैं।
पर इस कण को
स्वयं का महत्व नही पता।
यह पूर्ण अहंकार विहीन,
स्थिति में अपने
स्वभाव मूल में
प्रशांत अविचल
स्थित है।
यह कण अपनी
स्थिति में प्रसन्न,
शांत, निर्वाक,
सदियों से
उसी स्थान पर अचल,
मूर्ति की पवित्रता में स्थित है।
जिसके ऊपर वर्षों वर्ष
विशिष्टतम चंदनलेप,
नवल सुगंधित
पुष्पमाल,
रेशमी आवरण पट
युग युग से
चढ़ता आ रहा है।
इस एक कण ने,
शांत, एकरस
प्रवहित समय सरिता के
अविरल रल-प्रवाह में
अलग अलग काल खंडो के
प्रचंड भक्तों, सामान्य जनों
परम महिमावान, प्रतिष्ठित,
असाधारण चेतना सम्पन्न जनों
अनन्य भक्तों, दीन दुखियों,
योगी, सन्यासियों, पुजारियों को
यथा वांछित आशीर्वाद,
आश्रय, आध्यात्मिकता,
भौतिकता व आत्मिक शांति
सदियों से सदियों तक दी है।
यह ललाट मध्य स्थित कण
आदिकाल से
सिद्ध पूज्य विंदु रहा है।
कितनी क्षमता है,
इस कण विशेष की,
और आज भी उतना ही दिव्य,
नवल आभावान, पूज्य, प्रशंसित,
वरद, लोक अभिलषित, इच्छित है।
एक कण मात्र में
अनंत काल के लिए
कितना रहस्य और क्षमता
हो सकती है,
यह समझने के लिए
मूर्ति मस्तक का चमकता
यह कण पर्याप्त है।
इसी प्रकार “वह-विशेष”
हर-पवित्र और शांत-चीज में
अपनी उत्कृष्टता में बिंदु-बन
विद्यमान रहता है।
बस वह विशिष्टता
स्वयं सर्वोत्तम चरित्र में
शांत, स्थिर, अविचल,
अविकारी बन रहे।
हमारी सत संगति जितनी
अडिग और स्थाई होगी
हमारी प्रतिष्ठा उतनी ही
दीर्घ कालिक रहेगी।
न कि मूर्ति पर पुष्पमाल सी
रोज बदलती, दिखावटी,
सुंदर, व मात्र पवन झकोरों से
हिलने वाली।
सत्कार तो इसे भी मिलेगा
पर मात्र एक दिन के लिए।
इसलिए आइये बसि रहें उसमें
जो सत्य है, प्रेम है,
सर्वमय है, सर्वकालिक है
सार्वभौमिक, अक्षय, हितकारी है।
यदि त्याज्य, अवहित को चाहते है,
कितनी भी छोटी ही मात्रा में,
और वही करने लगेंगे तो
आप दूषित हो जाएंगे।
शक्ति और सम्मान
मात्र शुद्धता,
अविकारिता
और संयमी
को ही है ।
चाहे वह
अमृत हो
या विष।
यही सत्य है।
जय प्रकाश मिश्र
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