जुड़ जाती है जिंदगी, कुछ इस तरह,
यदि कभी तुमसे कहीं,
उस अनूठे प्रेम की
जिंदगी के रास्तों
में चलते चलते,
जानता अंजानता
चाहे जैसे
हेठी
हो जाए, तो,
तुम, पास जाना,
प्रायश्चित करना!
तुम,
कुछ...भी, कहना मत....!
उससे,
खड़े रहना...,
उसे देख, रोना आए
तुम्हें,
आंखे गीली करना, रो.. लेना!
वो कुछ भी कहे...,
उसे..... कहने देना।
अंदर से, जो निकले
निकलने... देना,
जब दोनो
चुप हो जाना,
आंखों और मुंह से,
तो, तुम..
चुप.., चल देना।
सुकून क्या है.. ?
शायद समझ पाओ...!
चुपके से... देखना,
उसे..! कभी,
छिप.. के,
दिल पे हाथ
रखना.., और दुआ करना,
किसी ने चाहा था तुम्हे, इस दुनियां में
बिना तुम्हारे, उसके लिए, कुछ भी किए।
आंखों में,
तसबीर... बने उसकी, बनने देना,
आगे बढ़ना, बस..
मोड़ मुड़ने से
पहले...
पीछे, देखना
उसके हिलते....
दुआ के हाथों को..
दिल से... सलाम कर लेना।
सच कहता हूं, सुनो,
ये मंजर...
अक्श हो जाएगा.
कहीं तुम्हारे गहरे...बहुत भीतर।
खुश... हो जाओगे,
जब कभी भी... आओगे,
हर बार, वो हाथ
हिलते हुए पाओगे।
भीतर से खिल जाओगे।
बूढ़े होने तक,
की गारंटी लेता हूं
जब कभी भी गुजरोगे उधर
तुम!
हर बार, तुम्हारी नज़र!
खोजेगी वही हिलते हाथ
और तुम उछलता हुआ किसी निर्दोष
बच्चे सा, खुशनुमा दिल पाओगे।
यही है सच्चे प्रेम की हेठी के
प्रायश्चित का फल।
क्या रखा है?
इस दुनियां में!
सब, रोज-रोज बनता है,
फिर, मिटता है।
सबसे अच्छा, अलबेला
फूल भी
सुबह.. खिलता, शाम झरता.. है।
यादें.. हैं, वो भी कुछ.. ही, हैं
”खास” होती हैं।
तुम्हारे हर हालात में,
तुम्हे क्षण भर
के लिए गुलों से भर भर
जिंदा कर लेतीं हैं।
जीते हो,
जाने न कितनी बार
जिंदगी में तुम उन्हें,
फिर भी
पुरानी होते हुए भी
पल भर में तुम्हें
खयालों में ही सही
मन से हरा कर देती हैं।
वो अकेला नहीं था, तब भी
जब वो अकेला तुम्हें दिखता था
सामने की भरी भीड़ से अलग
हटा सबको, केवल,
तुम्हे ही चुनता था।
कुछ तो था तुममें,
जिसकी, चाहत
उसको थी,
तभी तो अपना सुकून
उसने,
तुममें
सजा के चुपके से
तुम्हें बिन बताए
खुद ही छुपा के रखा था।
इसीलिए तो
तुम्हें देखते ही, उसके दिल को
अपना सुकून मिलता था।
समय की बात होती है,
तुमने इसे तमाशा समझा
नतीजा तभी तो ”वो” हुआ
उसके सच्चे प्रेम का
जनाजा निकला।
जगह खास होती है,
“कोई” किसी के लिए,
कुछ, किसी के लिए
तो कुछ किसी के लिए।
जुड़ जाती है जिंदगी,
कुछ इस तरह, साथ उसके,
चाहे फिर मिल न सकें
पूरी जिंदगी, कभी भी, साथ उसके।
जय प्रकाश मिश्र
Comments
Post a Comment