शब्द बोलते तो नहीं, बैठ जाते हैं भीतर।
शब्द,
बोलते तो नहीं
पर बैठते है,
भीतर कहीं,
धीरे से,
बिना आवाज।
ठीक
अपनी जगह।
प्रायः
पीठ पर अपने
जो जो लेकर आए,
आप में, सिस्टम से
रखते हुए।
कुछ, स्थिर
संस्पर्शी अर्थ लिए
समतल पृष्ठों पर
लिखे होते है,
पर गहरे
बहुत
गहरे
समाते,
असर करते,
ऊर्जा से उबलते हैं।
उठापटक मचाते
अंदर ही नहीं बाहर भी
फैल जाते हैं।
द्रव, तरल
बन
पानी से, हवा से
हर ओर
अपना गुरुत्व लेते,
जगह जगह।
बिन प्रयास, अपने आप
प्रसर जाते हैं।
रंग तो काले और सफेद
होते हैं इनके,
पर ”लाल खून” जाने कैसे
गरम हो जाता है, इनसे।
पर गजब हैं ये,
खुद हमेशा ठंडे ही बने रहते हैं ये।
इन पर, निगाह पड़ते ही।
कभी कभी
देखते ही देखते, इनको
कोई कोई नाचने, गाने,
अकेले में भी शर्माने
लगता है।
अब
क्या क्या, कहें,
कोई कोई तो
दिल थाम के
गीत गुनगुनाने
लगता है।
शब्द अक्षरों का समुच्चय होते है,
अपने में दुनिया सिमटे
चुप पड़े रहते हैं।
यह स्थिति,
रूप और
दुनियां के मर्म की
आत्मा होते हैं।
सब कुछ से निस्पृह, तटस्थ, शांत।
ये रंग रूप से अलग;
रंग रूप का सृजन,
परिवर्तन और
विसर्जन
करते
है।
द्वितीय पुष्प "मां मेरी"
वह प्रकृति है
हर रास्ता उसका
रहस्यों से भरा है
पास जा,
मगर मत छेड़ना।
सबल मां है,
कर्म की अनुयायिनी,
दूर से देखो मगन है
सृष्टि है।
कोई नहीं छोटा
बड़ा उसके लिए,
मान्यता, सामर्थ्य
पद, संपन्नता
कुछ भी नहीं उसके लिए।
उखाड़ फेंके जाने न कितने
राज्य, राजे, देश
उसने अनमने।
तुम, तुम्हारा मैं,
तुम्हारी शक्तियां
तुम्हारा दान, ये सम्मान
मिट्टी भी नहीं वह मानती।
जब हनन होगा
मान मर्दन कभी "उस सत्य" का
एक पल भी देर वह करती नहीं।
देवि है, ध्वंस उसका खेल है।
प्रार्थना है तुम सभी से
मत दुखाना दिल किसी
निरपराध का,
सदा खुश है
मगन है
चिर काल से
वह मां है मेरी।
अंधी है,
बहरी भी है,
इसलिए
आप पर जब आ ही जाती
कुछ नहीं है देखती, सुनती
बिभत्सता का नाच तांडव
रच गुजरती।
डरो मत!
मां है वो !
उसके लिए संहार क्या!
ताड़ना है,
"सृष्टि"
जिससे चल सके।
सृष्टि जिससे पल सके।
शांति नीरव क्षेत्र में है बास उसका
मत करो पीड़ित उसे
मगन रहने दो उसे
निज कर्म में,
साथ दो गर दे
सको तो
तुम
भी
अपना आज से।
हरित कर दो इस धरा को,
प्रेम से भर इस धरा को,
शांति से उस सत्य की रक्षा करो।
जीव को, हर वनस्पति को आदर करो।
शाश्वत सुख प्रसन्नता
सबके लिए हो यही
तो है चाहना मां की तेरे।
जय प्रकाश मिश्र
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