भर कहां पाया है अब तक।
खेलना एक
शुगल था,
मेरा, या
मन का
सोचता हूं,
भर कहां पाया है
अब तक
देखता हूं।
शुरू है,
जब घुनघुना
ले हाथ में,
झूमता था,
बैठकर
चुपचाप मैं।
पर नहीं,
उससे भी पहले…..
खेलना .. ..
मेरा गजब था,
कह रही थी
एक दिन
मम्मा मेरी,
हंसती हुई।
”सुन!
जब नहीं
चलता था तूं,
तो खेलता था
देखकर
जाने न क्या
दिन रात भर तूं।
हाथ पैरों को घुमाता
फेंकता था,
खुश बहुत था,
तब नहीं था
मन तेरा यह,
अहम तेरा
साथ तेरे
तूं मचलता था।
द्वितीय पुष्प : पावस ऋतु
तम को छिपाए, अंक में,
मखमली उस साल सा,
सलवटों पर खेलती द्युति
फिसलती है मोतियों की।
लरछियों की
हरिप्रभा ले
डालियों की
कालिमा,
अंक में
भर कर अंधेरे
पवन के संग
खेलती हैं।
पावसों के
दिन भी क्या हैं
मलिन हैं
पर प्रिय बहुत हैं,
रंग गाढ़े हो चुके हैं
श्यामता को
अंक लेकर।
मन हृदय के
अंक में ही
आ बसा है
देख तो अब।
इठल करती
टहनियां
संग पाकर
लरछियों का
हिल रही हैं,
झूम कर
जब डोलतीं है
मन भी लेकर
डोलती हैं।
पवन नटखट
कुहुल करता
घूमता है,
उराग्रों पर
पनपती इन
किसलयों संग।
दोलती
लय बद्ध क्रम में
पत्तियों का
यह समुच्चय,
चुप है पर कुछ
कह रहा है।
मूक हूं मैं,
बधिर भी हूं
इस लिए अनुमानता हूं।
दृष्टि बाधित
संग अपने
झूलते इन
लरछियो के
दोलनो की
कंछियो में
नयन मेरे
बिंध रहे हैं।
जय प्रकाश मिश्र
क
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