घर्षण का, चलने से क्या मतलब?

फर्क क्या था? 

मेरे पंख थे वो 

या मेरी पत्तियां 

मेरे साथ थे, 

मेरे लिए। 

कोई… उड़ने के लिए

तो कोई.. जीने के लिए।

लोगों का मुझसे, और

घर्षण का गति से क्या मतलब!

एक बार सोचो तो।


हिल रहे हों 

साख पर….,

या उड़ रहे

आकाश में हों…., 

पल पल… मेरा,

संबल… तो थे…। 

मेरे अंत तक,

मेरी दौड़ तक। 

मेरे साथ थे।

सच यही था।

दूसरों को, 

इससे क्या मतलब! 

सोचो तो।


उड़ रहे थे, 

वे जिधर… 

अपना वजूद 

तो था उधर..

वो कहते हैं

पत्ते मेरे, 

मुरझाए थे,

बस हिलडुल 

रहे थे,

साख पर, 

बोलते कुछ भी 

नहीं थे।


मैने कहा, 

लानत है! इनपर!

अरे वो तो 

तपती गर्मी से

अपने को बचाते 

फिर रहे थे।

आखिर,

इन सबको इससे 

क्या मतलब!

सोचो तो।


लोग, लोग हैं, 

कुछ भी कहें,

चलो हम आगे बढ़ें।

उन्हे रुक के, 

एक जगह

खड़े हो के

देखना है, 

एक ही 

जगह 

से 

देखते रहें।

पंख हों या पत्तियां

जीवनी शक्ति हैं, हमारी।

एक जीवन का संचार करती है,

तो दूसरी जीवन को नई दिशाएं देती है।

इन जड़ से खड़े लोगो को, 

इससे क्या मतलब।

सोचो तो।


सोचो, वे दोनों

मेरे पंख, मेरी पत्तियां

जिंदगी के भिन्न भिन्न 

पड़ावों पर, 

मुझ पर ही तो उगे थे।

एक कल्पना था 

उड़कर जीने के लिए,

एक कर्म था, 

कल्पना को पकड़ने के लिए।


व्यवस्था कैसी भी हो

प्रश्न उठाना, पीछे खींचना

रोकना, मजबूर करना।

सब स्वतः प्रेरित होता है।

घर्षण सा हर संभव गति के लिए, 

हर ओर यहां, 

इतना ही नहीं 

हमारे वजूद के पहले

ही उपस्थित रहता है, 

यह सब कुछ यहां।


तुम कुछ भी करो, चलो, बढ़ो

ये कभी साथ नहीं छोड़ते।

फिर भी मैं सोचता हूं! आखिर!

इस घर्षण का, चलने से,

और प्रगति का अवरोध से क्या मतलब?


क्या हर जीत के लिए, 

कदम भर भी आगे 

बढ़ने के लिए, 

कदम दर कदम, हर वक्त

इस घर्षण को, हराना जरूरी है।

क्या हर सफेद को 

बेहतर दिखने के लिए,

उससे कमतर सफेदी 

उसके पास रखना जरूरी है।

क्या हर शिखर को शिखर

बनाए रखने के लिए 

पास में एक गहरी, खांई भी जरूरी है।


थोड़ा ध्यान से देखें क्या 

अपनी, उनकी, सबकी

हंसी खुशी, सुख, सुविधा

संपन्नता, संतोष, प्रगति, शिक्षा

मात्र तुलना में ही नहीं तुली है।


जीवन की सारी दौड़, 

सारा समय, सारी व्यवस्था, 

सारे लोग, सारी अवस्था

देखो तो! 

इस “कुछ ज्यादा” पर नहीं टंग 

गई है।

हमे क्या चाहिए

हमे ही नहीं पता,

आस पास के लोगो से 

कुछ ज्यादा चाहिए 

बस यही पता।

बाकी आप भी तो कुछ सोचो

पर आप की सोच से मुझे मतलब है।

जय प्रकाश मिश्र




 






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