एक रस था, एक लय था, एक ही आनंद था
तैरता सौंदर्य है,
ज्यों
स्वर्ण के
आभूषणों पर,
दीप्ति हिलडुल
नाचती है,
चमचमाते
पृष्ठ ऊपर।
उभरते
आकार लेते
वक्रता ले उठ रहे
सुकुमार तन पर,
देखकर नव अंग की
सुषुमा मनोहर।
ले खड़े,
वय-संधि नद के
उफनते सागर तटों पर
प्रकृति नटखट नाचती
अनुपम हृदयहर।
संग जिनके,
दमकते दो कर्ण थे,
उस मधुमयी के
लटकते लर,
तरल हो, लय छंद, करते,
भावना की टोकरी
बन झूलते थे,
स्वर्ण से ही, मृदु,
मधुर सं-घात लेकर।
यह प्रकृति सौंदर्य का उद्गम है। सुख विलास और कला, जल रूप लेकर, इस प्रकृति निर्झारिणी से सतत बहता रहता है। यह नूतनता और अभिरामता को गोद में लिए घूमती फिरती है। सुंदर अंग, अंगसौष्ठव, रंग विन्यास, गदराते और गुदगुदाते रूप इसकी विशेषता हैं।
अंग पर खिल,
हिल ढुलकते
खिलखिलाते, विहंसते
आभूषणों की द्युति, अनामय
सिंजिनी के नूपूरों की
कनित ध्वनि के संग मिलकर।
मन सरोवर मथ रहीं थीं
पास में बैठे पथिक का
कलिल गति से सतत अविरल।
आदिम काल से मानव ने प्रकृति के पीछे पड़ अपनी सुख और समृद्धि की आशा लिए इसका पीछा किया है। उसे बत्सल प्रकृति ने कभी निराश नहीं किया अपने सीमांत देय देकर भी वह तुष्ट करती रही है। फिर भी मानव मन स्थिरता नहीं पकड़ता कुछ और के लिए लालायित रहता है। बच्चे की तरह नंगाता है वह मां सी डपटती भी है। मानव मन अविकल प्रकृति और उसके रहस्यों के पीछे पड़ा ही रहता है।
रूप की चादर बिछाए
प्रकृति विस्मित देखती थी,
पुष्प के संभार से
झुक झुक, पड़ी थी।
चहचहाते पक्षियों के कूजते
अभिराम रव में,
अनुभूतियाँ चामर डुलाती
सोचतीं थीं।
प्रकृति अप्रतिम सुंदरता को अपनी थाती की तरह प्रयोग करती है। सारे माहौल को अतिरंजित करने की सामर्थ्य रखती है।
कौन है यह पथिक!
जो चुपचाप बैठा।
सोचता… क्या
कर रहा.. अंतर्मनों में।
एक रस हो,
प्रकृति के रस भीगता.. ये
क्या एक सी,
उस चेतना में बह.. रहा ये।
प्रकृति के साथ चेतना भी गुथी हुईं हैं। मनुष्य के रूप में, और अन्य जीवों के रूप में वह इस मधुरता का पान करता है। तपस्वी भी आखिर आनंद की ही तलाश में रहते है बस वह इसे चिर और स्थाई अक्षुण्ण बनाए रखना चाहते हैं।
ढनकती थी,
चांदनी आकाश में
बिल्कुल अकेले।
चांद सिर नीचे किए
मुसका रहा था।
उज्ज्वला हिम राशि
सब कुछ देखकर
कंपित हृदय में,
स्फुरन नव पा रही थी।
बहने लगा था
धवल जल,
हिय की हिलक से
पत्थरो पर,
पर्वतों ने
सिर चढ़ाया
चमकते उस मुकुट को तब।
स्वर्ण बन जो दहकता है,
अरुण संग नित प्रात ही अब।
प्रकृति की पूर्णता उसकी आपस में सहभागिता से ही संभव होती है। संपूर्णता में यह प्रसन्नता के उत्स में नहा उठती है।उसके सिर पर तुषार बर्फ का मुकुट प्रातः काल में स्वर्ण मुकुट बन चमकता है।
डूबता वह पथिक
गहरे.. जा रहा था,
स्व में स्व के बोध को
वह पा रहा था।
ब्रह्मांड को गलते.. हुए
वह देखता था
चेतना… सबको ही
बनते.. देखता था।
"एक.. सुंदर… स्वर्ण… की
कंगन.. सरीखी आकृति को
बनते.. बिगड़ते. हर दशा में
स्वर्ण ही… वह पा. रहा था।"
सोचता था… सत्य.. क्या है?
मनुष्य विजय का आकांक्षी सदा से रहा है। संसार के गूढ़ रहस्यों को भी आत्मसात करना उसकी प्राथमिकता में है। अतः रूपों के भीतर वह झांकना चाहता है। पारगमन, अतिक्रमण उसकी प्रवृत्ति बन गई है। वह सत्य का संधान करना चाहता है।
स्वर्ण है, या
स्वर्ण की ही
आकृति यह!
मूल क्या है! सृष्टि का इस!
मिल गया उत्तर… उसे था।
आकृति हर बार सुंदर नवल
द्युति को.. बदलती….. थी।
पर स्वर्ण सच था.. जो नहीं
उससे अलग होता कभी.. था।
देख कर वह. चकित… था
विश्व बह कर मिट.. रहा था,
हर एक पल ही छीजता था
चेतना… में मिल… रहा था।
रूप सत्य नहीं होते, वास्तविकता रूप के अंतस में गर्भ में होती है। संसार में प्राणियों के रूप और शरीर निरंतर परिवर्तन शील हैं। विश्व चेतना ही अनेकानेक रूपो में प्राणी बन कर बहती रहती है। सत्य कंगन का रूप रंग बनावट नहीं उसका स्वर्ण है जो हर हाल में अपने वजन में अपरिवर्तनीय रहता है।
चेतना… स्थिर वहां थी,
स्वर्ण सी उस आकृति में,
स्वर्ण सी उस आकृति में।
खोल दीं आंखे पथिक ने
एक हो सौंदर्य… के संग
नृत्य… वह करने.. लगा
सच कहूं तो पथिक वह,
चिर चेतना की धार.. में
बहने लगा.., बहने लगा।
एक रस था
एक लय था
एक ही आनंद था
एक बन सब नाचते थे
एक ही वह उत्स था।
जब उस मूल और वास्तविकता को कोई जान जाता है की हर व्यक्ति में एक ही प्राण तत्व चेतना ही बाकी बची रहती है। शेष उनके व्यवहार समय, स्थान और परिवेश निर्धारित करते हैं। ऐसी स्थिति में उसे मनुष्य मात्र प्रिय हो जाता है। लोगो का कार्य व्यवहार सांसारिक परिस्थितियों के अंतर के कारण अलग है वह समष्टि से साम्य स्थापित कर लेता है।
जय प्रकाश मिश्र
Comments
Post a Comment