संकल्प मानवता का लिए वह बह रही थी।

वह नदी थी, बह रही थी, 

कौन जाने किस समय से

उस द्वीप के मरुभूमि ऊपर

यज्ञोंपवीती सूत्र बनकर

इस-पार से उस-पार अ-विरल

जल राशि लेकर मधुर शीतल।

बह रही थी, 

वह नदी थी बह रही थी।


कौन कारण मार्ग का था

आज जिस पर चल रही थी

कौन कारण मोड़ का था

मोड़  जिस-पर वह मुड़ी थी

हां, वह नदी थी, बह रही थी।


आंख से दिखता नहीं था

रास्ता लंबा बहुत था।

कौन संगी कौन साथी

कब, कहां, कैसे मिलेगा

कुछ नहीं, वह जानती थी

पर वह नदी थी, वह रही थी।

सतत आगे बढ़ रही थी।


वह एक थी 

उद्गम जहां था

मधुर जलराशि का 

संगम वहां था

फेन सी वह उठ रही थी 

गोदुग्ध सी स्वादिष्ट

तब थी। 

खींचती थी पास अपने

सूखती सी, यह धरा तब

पत्थरो के बीच से

वह तृप्ति का उदघोष 

करती बह रही थी।

कैसी हवाएं उठ रही थीं

फाड़ती थी मुख धरा का 

बाहर वो जब जब निकलती थी।

वह एक थी जब बह रही थी

लड़ती हुई उन पत्थरों से मस्त

आगे बढ़ रही थी।


फुफकारती 

घन नाद सी आवाज़ करती

चैलेंज देती ताकतों को

जो उसे घेरे खड़ी थीं।

वह नदी थी बह रही थी।

प्रेम था, अनुराग था,

स्नेह था अंतर में उसके।

तभी तो निश्चिंत होकर

सतत आगे बढ़ रही थी।

नदी थी वह बह रही थी।

विश्व का कल्याण 

उसके उर छिपा था

सब करूं प्रतिदान

उसके मन भरा था

देवि सा वरदान 

उसके अंग अंग छिपा था।

देह दुर्बल हो गई थी

ग्रीष्म में भी बह रही थी

पर वह नदी थी 

सिर्फ हम लोगों के लिए 

वह बह रही थी।

संकल्प मानवता का लिए 

वह बह रही थी।

जय प्रकाश मिश्र


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