अपने पवित्र कर्म तक सीमित रहो
उसने उस दिन
अपने असीमित भविष्य को
सीमित कर लिया,
जिस दिन
खुद आगे बढ़ने की जगह
अपने प्रतिद्वंदी को,
पीछे करने का
षड्यंत्र शुरू
कर दिया।
अब उसकी सोच में,
आगे बढ़ने के लिए
नवोन्मेष की योजना नहीं,
पीछे से सबक लेकर,
कमजोरियों को कसने की
संयोजना नहीं।
केवल और केवल
क्षण प्रति क्षण प्रतिद्वंदिता का
जहर भरा रहता था।
अपने प्रतिद्वंदी से
उल्टे-सीधे, औने-पौने, कैसे जीते,
सदा इसी का
सबब भरा रहता था।
वो अब अपने चहुंओर फैले,
निर्मल बहते, फुनगते,
खिलते, फलते, झरते
शाश्वत सत्य से दूर
अपनी व्यर्थ की
बनाई सीमा में
मशगूल,
प्रतिद्वंदी की मति, गति,
परिणति से चलता था,
इससे आगे वो नहीं बढ़ता था।
शायद यही उसकी नियति थी।
उसके भाग्य की यही परिणति थी।
यद्यपि, दिन दूर नहीं
जब वह अपनी क्षमता बढ़ा रहा था,
दुनियां के आकलन से दूर
अपने को खुले आसमान की
असीमित सीमा तक पहुंचाने के लिए
खुली सोच ले आगे बढ़ रहा था।
वो जानता था आगे बढ़ना,
दूसरों पर चढ़ना नहीं होता।
अपनी अच्छाई, निष्ठा,
अनुशासन, दायित्व बोध,
समयपालन, प्रतिबद्धता,
कर्मठता, एकता, संबद्धता
ही सतत आगे बढ़ने के
सच्चे उपकरण हैं।
बराबरी का लक्ष्य दूषित
मानसिकता का पथ हैं।
सूर्य किसी की बराबरी के
लिए ऊपर नहीं चढ़ता,
चांद किसी की प्रतिद्वंदिता में
शीतलता धारण नहीं करता।
प्रतिद्वंदिता बुद्धिमत्ता का
हरण कर नफरत का बीज बोती है।
करना ही है तो प्रतिस्पर्धा करो
यह तुम्हे थोड़ा आगे खींचती है।
किसी की बराबरी के लिए
किसी को नीचे गिराना,
घात प्रतिघात करना,
अपना प्राथमिक
उद्देश्य छोड़
उसके
पीछे
लगना,
पथ भ्रष्ट की शुरुआत होती है,
यहीं से उसके पराभव की
सरिता निकलती है।
इसी लिए निरपेक्ष हो आगे बढ़ो
केवल अपने पवित्र कर्म तक सीमित रहो।
जय प्रकाश मिश्र
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