मोमबत्ती हाथ में ले घूमते हैं।
प्र-फुल्लित होना,
खुश-मिजाज रहना,
ऊर्जा से लबा-लब बहना,
मन को कहना:
दुनियां की सुंदरता देखे
आनंदित रहे ऐसे,
हरी हरी दूब देख कोई गाय
आनंदित हो जैसे।
अभिवृद्धि की सीमाएं छूना,
हृदय में उत्स के उद्गार भरना,
मनोवांछित प्राप्ति के लिए
पवित्र कर्म करना।
दुनियां में सरल हृदय बन,
विशाल सोचें ऐसे,
पिता अपने पुत्र के लिए
भावी सोच रखे जैसे।
शुभेक्षाएं फैलें चंहुओर तुम्हारे,
स्वस्थ मन, बुद्धि, चेतना हो तुम्हारी
अंग सबल, प्रबल, समर्थ रखें तुम्हें।
अभिलाषाएं लता सी
ऊपर चढ़ती पुष्पित हो ऐसे,
शुद्ध-शीतल-धवल-युवा
चांदनी नभ नापे जैसे।
खुशियों से पगी जिंदगी हो,
संगी, साथी, प्रिय से हरी भरी हो,
घरों से आंखुरों की किलकारियां निकलती हों।
प्रेम परिवार में, अपनों में,
सबमें बढ़े कुछ ऐसे,
बन लताएं आपस में
जटिल संकुल बनाएं जैसे।
जय प्रकाश मिश्र
अ- द्वितीय पंक्तियां
ये क्या हुआ…. हमको
कि हम अब,
छोड़ कर
अपनी
कलश
ऊपर प्रजल्वित
दीप की उस संस्कृति को,
मोमबत्ती हाथ में
ले घूमते हैं।
छोड़
निज
घर बार
रिश्ते नात को,
बेईमान दगाबाजों के रंग,
रंग, साथ में हिलमिल, दिन रात घूमते हैं।
जय प्रकाश मिश्र
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