जन्म पीछे जन्म है, मृत्यु पीछे मृत्यु देखो।
स्वीकृत व्यवस्थाओं और मान्यताओं के अतिरिक्त और विरुद्ध भी भाव विचार व्यक्ति,व्यक्ति में,अलग पृष्ठभूमि लेकर उठते रहते हैं। विद्रोह,प्रतिवाद और तर्क मनुष्य में रहता ही है। उनका एक चित्रण अंतरभावो के साथ रखा गया है। कुछ सामान्य सामयिक आंतरिक कारकों को भी समेटने की कोशिश की गई है जैसे शांति, चेतना आदि। आप पढ़े और विचार छाया में विश्राम पाएं यही लक्ष्य है।
उसने कहा
मैं चेतना हूं
मुक्त सारी
मुश्किलों से,
मैने कहा तूं
वासना है
सुप्त सारी
इंद्रियों में।
उसने कहा
मैं सर्वव्यापी
सर्वमय
शाश्वत सदा हूं,
व्याप्त हूं, संव्याप्त हूं
सारे जगत में एक सा।
मैने कहा तूं
प्यास... है, इन इंद्रियों की..
अभिशप्त है....
इन इंद्रियों के साथ... से।
उसने कहा
‘अज्ञेय हूं मैं’,
“जो” देखता है,
देखता “जो” है
वही मैं चेतना हूं। (दृष्टा और दृश्य दोनो मैं हूं)
मैंने कहा
तूं अहम है,
तूं स्वार्थ है,
अवतार है
हर वेदना का।
उसने कहा
महसूस करना, चाहते हो?
अभी, क्या तुम!
कौन हूं, “मैं” !
तो
बैठ जा,
कर ‘बंद’,
आंखे,
देख सारे विश्व को
“चलता हुआ,”
बह रही है नदी, सागर उमड़ते हैं
गा रहीं चिड़ियां, ये बादल डोलते हैं।
सृष्टि सारी, विश्व को खुद में समेटे,
अपनी गती में, चल रही है,
क्या कहीं कोई रुकावट
दीखती तुझको कहीं है।
जन्म पीछे जन्म है,
मृत्यु पीछे मृत्यु देखो
समय के इस चक्र पर
नियति सबको संग लेकर चल रही है।
ले तुझे जग चल रहा!
अब देख मुझको।
एक ही संव्याप्त हूं, मैं
हर एक कणों में,
एक लय से
हर पलों में।
मैंने कहा तूं
भूख है, तूं व्याधि है
तूं विश्व का परिताप है।
छलनामयी है प्रकृति तेरी
विश्वास का अपघात है।
उसने कहा मैं शक्ति हूं
मैं युक्ति हूं,
मैं मूल हूं,
इस जगत का।
विश्व की
परिचालना का श्रेय
मुझ पर है टिका।
कुछ सोच तो!
भूख हो या व्याधि हो
विश्व का परिताप हो,
छलछलाता छल
यहां जो बह रहा है,
हैं यही, वह स्रोत
यह जग जहां से चल रहा है।
खींचते जग को सदा
केवल किनारे जा रहे हैं,
जग खड़ा है एक लय में
भागते सब जा रहे हैं।
‘तो शांति क्या है’
तुम बताओ पूछ बैठा
मैं उसी से :
चाहते हो मैं बताऊं
कौन स्थिर शांत है,
कौन कितना है भला,
कौन कितना क्लांत है?
“आज में जो तुष्ट हो…
चिंता नहीं
कल की
जिसे हो..
आज ही में
मस्त हो..
है वही बस शांत, जो
हर कामना से मुक्त हो।”
चिंता जिसे हो मंजिलों की
कामना से युक्त हो
एक क्षण जिसपर नहीं हो
जो क्षणों का दास हो
क्लांत है, वह क्लांत है,
क्लांति उसके पास है।
मिल गए हो तो बता दो;
कौन हो तुम “चेतना” ?
जानना मैं चाहता हूं!
बोल बैठा,
तो सुनो:
‘बैठते ही,
एक क्षण को,
खोजते हो,
काम तुम,
क्या करूं,
क्या क्या जुटा लूं,
नहि चाहते विश्राम तुम’।
खोजते हो चेतना को
जो तुम्हारे साथ है,
दौड़ती है जिंदगी बन
हर क्षण तेरे ही साथ है।
अहम बन कर बीज बोती से
युक्तियों के जाल में,
जब उतरती इंद्रियों में
जीव बन जाती है वो,
संग जग के खेल करती
एक हो जाती है वो।
जब नहीं कुछ शेष बचता
जानने को है यहां,
शून्यता के साम्य में वह लौटती है,
मुक्त हो, अंतरतमों के, मार्ग से।
जय प्रकाश मिश्र
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