खिलखिला एक बार हंस लूं ! जिंदगी में,
कोई गीत.. गाओ.. जिंदगी का…
आज फिर एक बार.. पिछला,
सुन कोयलिया… पिन्हकती थी…
डाल पर...एक हूक देती…
टीसता… था, दर्द.. मेरा
वो पुराना.. बालपन… का।
फिर सुआओ, आज तुम…
एक बार फिर से,
चाहता हूं, मैं गुजरना
टीस से उस, जो फंसी है
बिंदु सी मेरे हृदय में।
कुछ करो… तुम आज ऐसा…,
देख तुझको.. झूम जाऊं…
पेड़ की उन टहनियों सी
लिपट जाऊं, अंक में…
मैं, फिर तुम्हारे,
बेसुध नचूं…तेरी ताल पर
और चूर हो थक हार कर
फिर…बैठ जाऊं…,
मैं यहीं पर।
आज फिर एक बार,
सच मैं चाहता हूं…
कुछ करो!तुम!
छेड़ तो तुम, "वो तराना"…
था पुराना
सुन जिसे हम मुस्कुराकर..
प्यार से नजरें…झुकाकर…
बैठ कर मजधार तिरते
पतवार बिन बहती तरी सा…
तैरते चुपचाप थे, दूर तक
बिलकुल अकेले,
आनंद लहरी, की नदी में…,
कुछ ही क्षणों में…
छोड़ युग की चाहतों को…शून्य तक।
कुछ करो!
एक बार
फिर से!
चाहती हूं उन क्षणों
में लौट पाऊं।
सोचती.. हूं..
"खिलखिला एक बार हंस लूं!"
जिंदगी में, साथ तेरे
उन क्षणों सा, जो नहीं अब साथ हैं
दूर कितना खो गए हैं
भागती इस जिंदगी में।
कुछ करो एक बार फिर तुम
चाहती हूं।
जय प्रकाश मिश्र
भाव: जीवन के आरंभ की स्मृतियां सामान्यतः सदा मीठी ही होती है। मन उन क्षणों को याद कर आनंदित होता है और फिर फिर उनकी परावर्तन की कामना भी करता है।
Comments
Post a Comment