सत्य के रेशों को चुनचुन, चाहता हूं कल बुनुं

समय को जब आग पर मैं सेंकता हूं

फुलझड़ी कोई कही तब एक पाता

शब्द का परिधान उसपर मैं चढ़ाकर

एक कविता हूं तुम्हें मैं भेज पाता।


आपको अपना समझ कर भेजता हूं

राज अन्तस के मैं सारे खोलता हूं।

डूब कर तुम, संग मेरे बह सको

हृदय का रस संग इसके घोलता हूं।


शब्द जब तब निकलते है, फिसलते है,

पकड़ता हूं दौड़ कर तेरे लिए मैं, 

तौलता हूं, वजन इनका बार बार 

तब कही लेकर इन्हें मिलता तुम्हे हूं।


तुम पढ़ो या फेंक दो,

फूल तो खिलते रहेंगे,

पेड़ जो उपवन लगा हो

या जंगलों के बीच हो।


महकना है काम उसका

रोज खिलना काम उसका

तोड़ लो तो तोड़ लो

छोड़ दो तो छोड़ दो।


मैं.., मैं चाहता हूं कल बुनुं 

सुंदर, सुगढ़, अनुपम बुनूँ 

सत्य के रेशों को चुनचुन, 

तेरे हाथ का.. कंगन बुनूं।

जय प्रकाश







Comments

  1. Replies
    1. उंगलियां चार ही होती है कुछ देने के लिए, अंगूठा तो किसी को किसी को नहीं दिखाते।

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