खिलने दो, मुस्कुराने दो, जीने भी दो इन्हें,

खिलने दो, मुस्कुराने दो, जीने भी दो इन्हें

ये डालियां… 

जिन पर नहीं 

अब….

पत्ते… एक.. हैं,

सूखी लगेंगी

तुमको…

मगर 

फूलने को हैं।

(समाज में जब शून्यता आ जाए, तो कुछ भीतर बड़ा पलता है, आंतरिक शांति और एकांत विशेष मनन और परिणाम का आश्रय होता है)

जब हरी… 

थीं कोपलें…

वर्षात….. 

यहां थी…।

सहते… हुए 

ये शीत.. 

विकल.. 

झूमने… को हैं।

(जब लोक निधि का सही उपयोग होता है तो चहुओर समृद्धि फैलती है, पर समाज के किसी भी वर्ग में अत्यधिक कष्ट या परेशानियां अनावश्यक अशांति होती है तो यही विप्लव कारी होती हैं।)

खिलने दो.., 

मुस्कुराने दो...,

जीने भी दो... इन्हें,

देखो न,

ज्वालामुखी

कोई फूटने को है।

( समाज में बराबरी, और अवसर की समानता न होने से ही क्रांति का जन्म होता है। )

मत बंद करो 

रास्ते, 

झोंके हवाओं के, 

बच्चे हों या बूढ़े 

जिम्मेदारी 

सभी के हैं।

(हर वर्ग के वृद्ध और बच्चे हमारी सम्मिलित जिम्मेदारी होते हैं वे समाज की धरोहर और भविष्य होते हैं। )

आने दो 

थोड़ी धूप 

आंगन में भी इनके,

रखने को पांव, 

चलने को जगह, 

तो चाहिए इन्हें।

(आम आवश्यकताएं तो सभी को चाहिए, सभी लोगो को इसपर मिलकर काम करना चाहिए।)

वह अकेला सोचता था, 

कुछ करे अस्तित्व पाए।

धूल… जीवन न बने…, 

फूल बनकर महक जाए।

(हर कोई इसमें सक्रिय भाग ले और अपने को कम न समझे, अच्छे कार्य कर अपने को स्थापित कर सकता है।)

जय प्रकाश

1.  5😊😊 sri V B Singh

2.  सर सभी अच्छी हैं।🙏 श्री अस्थाना जी 

3.  आदरणीय बड़ेभाई, मुझमें कविता की ग्रेडिंग की क्षमता नहीं है।आपका दिन मंगलमय होऔर आपकी कीर्ति दिगदिगन्त तक आलोकित हो।💐💐🙏🙏  श्री के पी त्रिपाठी

4. 4 अंक श्री आदिल बेग जी।

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