आ.. चलें, बाजार में, बस, घूमने

मित्रों, जीवन सीमित क्षेत्र में नहीं, असीमितता इसका गूढ़ार्थ है, मात्र जरूरत और दैनिक कार्य पद्धति से इतर इसका आनंद झरता है। इसी पर कुछ लाइने आपके आनंदार्थ प्रस्तुत हैं।

आ.. चलें, बाजार में, 

बस, घूमने 

देखें, 

वहां, 

कुछ, नया! है क्या ? 


क्या? कह... रहे हो! 

बासी.. पड़ी, 

सुस्त.. 

सी.., 

उन, दुकानों.. में, 

रह..-रह..., सुबुकुती, 

इस, रिमिझिमी... बरसात में, 

स्याह होते, धुंधलकों में, 

टिप-टिप, टुपुकुती, 

झरती हुई, 

आंसुओं सी रिस रही, 

चंचला... 

इन बदलियों की, आंख से,

नीचे धरा पर,

भिगाती, 

यह, जुल्फ मेरी, इस तरह!  

ठंड के, इस महीने में,

बता न! यहां 

इस बाजार में, रक्खा भी क्या है? 


अरे..! 

नहीं... रे! 

हम... मिलेंगे, 

चुटकुले से, हंस रहे, 

किसी रंग.. से, 

फ्रेश, फिसलती, 

जिसे..! 

हाथ से, हो.. पकड़ती! 

जान कर, अंजान.. 

बन..ती,

बस 

यूं..  ही..., 

गुलाबी, रंग.. ओढ़नी, से...!

आ.. चलें, बाजार में, बस, घूमने।


हम मिलेंगे,

फुदकते, फाख्ता के, 

चुटुल.. शिशु से, 

लरज़तें, 

अद्भुत अनोखे, 

प्यारे प्रिये! किसी अजनबी से,

आ.. चलें, बाजार में, बस, घूमने।


सच, कह रहा हूँ! 

जानता हूं! 

इतने..., 

दिनों.. से, आ.. रहा हूं! 

मैं, इसी.. बाजार में, 

इस, गंज.. में, 

क्रिया है, 

एक, 

अनूठी.. हर शाम को, 

गंजिंग है, होती..., 

यहां.. 

ही

गलियों में इन! 

हारते, जीते.. हुए, रूठे.. हुए

इस जिंदगी से,  

समय से लड़ते हुए, 

सीखे.. हुए कुछ, 

नौ..सिखे.. 

उदात्त 

मन, 

के

इन किशोरों.. की, रोज ही।


स्याह होते धुंधलकों के बीच ही, 

इन रिमझिमी बरसात में।


देख न! 

क्या, उम्र.. है? 

तंतु.. हैं, सब, लग रहे 

नव.. विकसते! 

नर्म हैं, मन 

सभी 

के

निश्चिंत.. हैं, ये 

फिर भी 

कैसे..!

बेफिक्र कितने, इन क्षणों में...।


दूर....उन

आते.... हुए, 

भविष्य के, दुर्दांत क्षण से! 

पर जिंदगी! वास्तव में  

मात्र ये ही, जी.. रहे।


बस, 

कुछ क्षणों का

ख्वाब! 

सब 

बुनते, यहां, 

प्रफुल्लित हो!  देख कैसे! 


इशारों... 

पर 

नाचते.. हैं, 

दिल, हैं... देते...

दिल हैं, लेते..

एक 

क्षण में..

क्षणों में ये, जी हैं लेते, 

जिंदगी...! 

जिंदगी को, भूलकर

बेकार 

की,

अनुभूतियों में

आपस.... मिलकर, क्षणिक ही।


देख तो, 

मेरे साथ एक दिन!

सहज कितने, सरल कितने..

स्वप्न ले आंखों में अपने! 

उतरते हैं, शाम को 

हर, पक्षियों से,

गंज 

में,

पर, रुपए.. दस बीस ही हैं 

खर्चते....

आ.. चलें, बाजार में, 

बस, घूमने 

देखें, 

वहां, क्या नया है कुछ!  


नुमाइश बन, घूमते ये

उछलते,  

किसी गेंद से, आगे से पीछे

लहर आती समंदर से

देख ऐसे! 

खिलती कली से...

खुश हैं ये..

परिंदों से उड़ रहे, स्वप्न में

आ.. चलें, बाजार में, 

आज, बस.., हम घूमने।


पग दो...

आ चलें हम गांव...की 

एक हॉट में, 

देख न! विशाल इतने बगीचे में 

लगी है,

पेड़ों के नीचे।

लोग बैठे.. ढेरियां.. हैं सामने, 

सामान की

जमीनों पर, बिछे हैं, जाजिम रंगीले।

आ चलें हम गांव...की एक हॉट में।


लंबे चौड़े, दूर तक, 

रंग.. बिरंगे.. उद्यान हों, 

फल सब्जियों के

सप्ताह में, बस एक दिन, 

टेंपरेरी जरूरत को, 

ध्यान में रख, मात्र लगते।

आ चलें, इस हाट को हम, घूमने।


सुन यहां...

बजते हुए, पाजेब हैं ! 

गजब! के

हाट में, लोग भी हैं  

मस्त कैसे, घूमते..

साथ लड़ते, लटकते कान से ले 

पैर तक इन घुंघरुओं, 

में जान! है,

छनछन! छनाछन! ये हैं, बजते, 

बुलाते हैं, रान्धते मन! 

स्पर्श! करते हृदय! के..

अजनबी, 

कब मानते है किसी को

बंधु ही तो मानते हैं सभी को

लाल रक्तिम पांव रंगा, 

देख न! 

कुछ कह रहे हैं, मात्र तुमसे! 

निखरते, सौंदर्य को तूं! 

निरख रे! 

किसी चांद से, चांदनी से 

उच्च हैं ये, भागीरथी से

दृष्टि भर के..

देख ले,

आ.. चलें, बाजार में, बस, घूमने।

बुद्धि पट को खोल कर, आनंद लेने।

जय प्रकाश मिश्र


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