बस, पूछता हूँ, बता दो न!

मित्रों, जीवन तृष्णा का नृत्य! और हम उसके पात्र! अंत में देखा भी है, क्या शेष बचता है, और क्या चाह बचती है, आज की पंक्तियां इसी पर, आप पढ़ आनंद लें।

बस, पूछता हूँ, बता दो न! 
अंत में, क्या चाह!  
बच, रहती 
यहां, 
पर, 
सभी को ?  

इन जीवनों 
में..., 
जन्म से ले,
मृत्यु तक, 
व्यापार कर, 
बलिदान कर
दान कर, उत्सर्ग कर, 
हर एषणा से, भावना, कर्तव्य कर,
अभिमान भर भर 
जिए जो!  
अहा,
उनके भी प्रिये! अंतिम 
चरण... में।

क्या है बचता, प्रयाण में
अवसान के क्षण! 
शेष रहता।
कुछ तो
होगा
बस चाहता हूं जानना,
मुझको बता दो? 

कौन सी वह कामना! निःशेष 
रहती, और सब 
तिरोहित
होता.. उसी में।

शब्द तो वह 'एक' ही है,
पर शब्द भी तो 
नहीं.. है,
क्या 
कहूं! तुम खुद 
समझ 
लो..., 
वह प्रार्थना भी, मौन ही है
मन हृदय से, 
दूर है, ध्वनि तरंगों से
सूक्ष्म है, अतिसूक्ष्म से।
 
निःशब्द! 
प्रिय! 
तब शब्द होते! 
छिटक जाते... कंठ से
स्वांस से ये निकलते हैं..
विकलता.. में, 
कष्ट में हैं, भूल जाते, 
चाहते हो पूछना
तो पूछ लो, श्रीकृष्ण से! 
क्या हुआ, अंतिम समय में? 

प्रभास 
में, 
लय विलय कर 
निज वंश को, श्राप से...
दुर्वासा सहित गांधारी के प्रिय! 
जरा के उस बाण से..
जब मृत्यु शैय्या पर पड़े
कोई नहीं था, साथ उनके,
द्रौपदी, रुक्मिणी, 
सत्यभामा, अर्जुन प्रिये।

हो.. व्यथित! वे अंत...में, 
निष्प्राण... हों, 
उससे पहले 
पूछ तो
भगवान थे,
क्या वे भी, वही थे सोचते! 

बस, कुछ नहीं था, 
धर्म.. यह, 
पाखंड.. यह, 
अंतिम क्षणों 
में 
पीपल के नीचे 
मृत्यु शैय्या पर पड़े , 

क्षमा कर
हे! 
ईश.. मेरे करतबों को,
यातना से मुक्ति दे, 
बस शांति दे, दे! 
शांति दे.. दे...
कह रहे थे।

समर्पण ही पूर्णता में! 
संग शांति! ही 
वह कामना है
यही बचती अंत में।

कर्म सारे, धर्म सारे, शत्रु सारे 
मित्र ही क्यों, सखा सारे...
दुलारे.. भी
भूल जाते, अंतिम समय में! 
शांति की ही कामना
बचती हृदय में।

वही अंत है, वही मौन है, 
ओम्  में, शांति में, 
चिर शांति.. की ही कामना 
अवसान है, अंतिम चरण में।

ॐ अंतरिक्षम शांति, वनस्पतयः शांति..
... शान्तिरेधिह शांति।

जय प्रकाश मिश्र


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