उसकी, ये जिद है,

मित्रों, कुछ क्षणिकाएं आपके आनंदार्थ प्रस्तुत हैं, आप पढ़ें आनंद लें।

उसकी, ये जिद है, 
रुस्तम, 
वो, ही... बने, 
मीनार..-ए-ऊंचाई.., वह.. 
ही..., चढ़ें,
साथ जिद... ये भी, 
जमीं...., 
छूटे... नहीं, साथ.., रखे।

वो चाहता है, 
उसके, पास... 
नीचे... 
उतर.. आए, 
उतनी.... ऊंची! बुर्ज ए 
मीनार..! 
सजी, सजाई..
आफ़ताबी!  जर्रा बन के।

पैरों के 
नीचे, 
छूए.. तलवे उसके
और वो, 
नीचे 
जमी पर, ही... रहे।
वो, दरिया.. बेशक हो, 
पर, समंदर! पे, राज.. करे।

अहंकार! नकार है, 
सांसों में, 
अटक जाता है,
'नियति का नियंत्रण सबपर है, 
प्रभुत्व.. उसका है'
उठती.. लहरों से, 
और  उससे,  
ये बात, कौन.., 
नीचे खड़ा हो, ऊपर.. 
कैसे.. कहे?   

महत्वाकांक्षा, अच्छी है
गति.. देती है,
पर, 
निगल लेती है
जीवन के, 
प्यार भरे, क्षण...!
वो समझता ही नहीं
रात दिन एक किए रहता है...
जीवन का श्रृंग, 
शिखर!  
पहाड़... का 
छोटा होता है, आधार से,
हमेशा...
ये बात उससे कौन कहे।

परिंदा!  
उड़ता हो, कितना ऊंचा...!
पर अपनी, हल्की, 
काली... सी.. परछाई... 
इंच भर ऊंचा, 
उठा.. नहीं सकता, कभी जमीं से,
ये बात 
उससे, कौन... कहे।

तिस पर, उसका 
आत्मविश्वास 
इतना....ऊंचा!
भाई कहीं तो, 
उसको, कोई! धोखा है।

गौर... से देखा 
तो, वहां..., 
मै.., भी नहीं...., 
केवल, आँखें... थीं, मेरी..।
सुबकतीं, एहसासती 
वो... लंबी, सांसे... 
मेरे भीतर, 
आखिर! 
किसकी.... थीं 
उसी में डूबा...हूं! 
आज तलक, चुप बैठा हूँ! 

घर से ऊब, घर.. से, दूर, 
लोग, आते 
क्यों 
हैं? 
फिर ‘घर सी सुविधा’ 
में ही आखिर!  
समाते.. 
क्यों 
हैं? 
कैसी उधेड़ बुन में, 
लगे रहते हैं 
रातदिन! 
ये 
लोग! 
आखिर अपनों को छोड़, 
लोगो को, अपना... 
बनाते..., 
क्यों 
हैं? 

पग दो:

गंदा नाला 
हर समाज में होता ही है,
देश हो या 
विदेश 
हिंदुस्तानी हो या अंग्रेज।

मल और मल जल 
हमारे कर्मों के
फल
समाज से 
निकालने के लिए 
हमेशा एक 
गंदा नाला ही क्यों रहता है? 

चुपचाप घरों के पीछे 
गुजरता, 
किसी से कुछ नहीं कहता
बिन बोले ही बहता.....
आज तक क्यों अनवरत
इन्हें इनका हक मिलेगा कब? 

काली काइयों के बीच, 
ढोता, घरों का सारा 
ऊंच... नीच...,
शांत, सरल, सहज, 
निर्भीक...।  
चेतना! इसमें, 
तुम जैसी 
ही है, 
बहती...!

हरे भरे झाड़ियों को किनारे 
दोनों कंधों पर बैठाए 
कितना खुश! 
अपने में ही मगन रहता 
रातोदिन। 
सोचना! समृद्धि का कारण 
यही है, तुम्हारे! 

कुछ
लोगो को 
हवाओं के उल्टा चलने पर 
उससे बेशक 
शिकायत रहती होगी,
पर उसे किसी से कोई....
शिकायत नहीं, मलाल नहीं। 
जीवट का कमाल यही।

ऐसे तो 
अच्छी.. और आधुनिक..
जिंदगी का एक कड़ुआ सच! 
यह गंदगी... 
और गंदगी का अंबार ही है, 
बेशक पीछे रहती है, 
सामने से चिकनी दिखती है,
आदमी का चेहरा, हो या 
फर्श-ए-दीवार!  
बस, दिखाई न दे 
खर पतवार
इसलिए! 
बंद पैकेटों और नालों से बहती है। 

सोचता हूं, 
वह भी, हम ही तो हैं? 
बस, अब.. अस्वीकृत, 
नापसंद.., बेमतलब..! 
गुलदस्ता बन कर, 
कभी जो फ्रंट पर था! 
मुंह पर क्रीम पुता..
इतना प्रिय था,
मुरझाते ही डस्टबिन में 
और कहां? 
मुंह धुलकर क्रीम! वाशबेसिन से
और कहां? 
यही तो है 
आधुनिक, भव्य, सभ्य
आज जिंदगी! और कहां! 

सच है, 
किसी का भी पीछा 
यह गंदगी, जीते जी 
नहीं छोड़ती, 
कुछ भी करो..
फैली है, 
नहीं! फैलाई है हमने
हर तरफ...खुद, अपने...।
 
अपनी स्वीकृत प्रणाली से
जीवन शैली से
कहो, 
कपड़ों पर, मुंह पर, आंखों पर
और आज सच है चरित्र! पर, 
पर आज तो, बच्चों बूढों 
और
औरतों का वध कर
अरूप आत्मा तक! 
पहुंची है गंदगी।

कोई हो, 
कहीं हो, सबकी माप
नाप ले कोई 
मनुष्यता की, मात्र... घुटने तक।

पूरे विश्व में,
सब देशों में, कितना उन्नत हो
सब जगह, बहता है 
यही नाला, 
बस, अलग अलग रूपों में।
कहीं अमृत में विष! तो कहीं 
क्रमशः विष!  
कभी मिलाजुला 
रूप भी बदलती है, यह गंदगी
कहते हैं इसी में 
पानी ले आता है 
सभी...
बड़े बड़े कल-कारखानों, 
घरानों, बिल्डरों, 
बूचड़खानों, जुआघरों,
शराबघरों, खदानों, 
खानदानी अफलातूनो 
कंपनियों और राज घरानों का
सारा व्यसन, 
शौक, बहा बहा कर
आखिर, एक दिन, सबकुछ...
यह गंदगी ही तो बन जाता है।
हमने आज तक 
प्रगति कर 
यही तो कमाया है।
धरती छोड़, 
मान मेरी 
कूड़ा फेकने आदमी, 
समंदर में आज आमादा है। 

जय प्रकाश मिश्र


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