श्रीकृष्णरस-अमृतम-अनुपमेयम'
मित्रों 'कृष्णरस-अनुपमेय-अमृत' आप भी चखें। श्रीराधेसखा-बालकृष्ण श्रीराधिका जी से जीवन भर के लिए, अंतिम विदा लेने खड़े हैं, अक्रूर जी उन्हें मथुरा ले जाएंगे, कंस के कारण उनका लौटना असंभव। राधा के सामने कृष्ण एकांत में खड़े हैं, श्रीराधा! क्या कहें, इसी पर आज की पंक्तियां आप के आनंदार्थ।
बिदाई.. पर,
शब्द!
राधे... क्या कहें!
अक्षर,
अधर! पर, उभरते..
फिर, छलक..
जाते,
दृगों.. से
ढुर..ढुर.. ढुलकते
आंसू, बने...
बिदाई पर, शब्द.. राधे क्या कहे!
कपोलों के, रंग ले...
अनुरक्त.. होते,
भावना.. में
बदलते,
स्वेद
बन... कर
ठुड्डियों पर चमकते!
बिदाई पर शब्द राधे क्या कहे!
टपक! जाते,
वक्ष पर,
मणि कौस्तुभ हों, हिलते डुलते,
हृदय पाथर, रिस रहा हो,
कष्ट अपना, कह रहा हो
हर तरफ से !
बिदाई पर शब्द राधे क्या कहे!
वन-लताओं से, हाथ पर,
पुंछते हुए,
स्पर्श करते उंगलियों का
नीचे,... सरकते
उतरते....
वसुओं के संग, तर्जनी की
आखिरी उस पोर पर
आ अंटकते...
बिदाई पर शब्द राधे क्या कहे!
आंचल की कोरों, में लिपटते...
कई परतों,
पुनः खुलते, फिर लिपटते
खुलते लिपटते, ही रहे..
उन्हीं क्रम में,
मौन में, सब कह दिए..
बिदाई पर शब्द राधे क्या कहे!
कृष्ण ने देखा...
पिए!
शब्द राधे के बंधे!
बंटे! हैं, हर अंग में!
स्वांस में,
हैं, उपजते,
नि: श्वास में, चुप.. झर रहे,
आंसू बने, वे बह रहे हैं अनवरत!
उंगलियों से ओढ़नी में लिपटते
पढ़ लिए सब! सुन लिए!
फिर, झुक गए,
नमन कर, कुछ कह गए!
और, चल दिए...
बिदाई पर शब्द राधे क्या कहे!
जय प्रकाश मिश्र
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