चल बंधनों को खोलते हैं।

मित्रों, दुख, व्यथा, संताप, क्लेश, चिंता, भय सभी मानसिक ही हैं और इन सबकी जड़ विचारों में दबी होती है। यद्यपि मन बना ही है खुश रहने के लिए, फिर भी अचानक कोई विचार आ जाता है और हम अच्छे माहौल में भी होते हुए उससे दूर! इसी पर आज की लाइने, आप पढ़ आनंद लें।

मन की, सहज.. गति,
शांति.. निर्मल, 
और सुंदर..! 
स्वभावतः यह... 
अनवरत..., 
मानस की अपनी, 
झील... में 
स्मृति.. के, पूल में 
गोता लगाता, तैरता है।

फिर भी अचानक
स्मृति... 
कभी 
उभरती, कभी डूबती
धूमिल सी 
होती 
बस एक दो 
स्पष्ट होते विचारों की 
तरंगों.... पर! 
चांदनी... सी, 
उछलती।
कलकल, अनामय, 
श्वेत निर्झर!
प्रीति भर.. भर.. दौड़ती।

और "मैं" 
एक...
व्यग्र.. हूँ! उद्विग्न.. हूँ! 
दुनियां में इस,
जल रहा, 
बिन.. अग्नि ही! 
इन विचारों की अग्नि में।

देख.. कैसे? 
अंतरों... में, 
खुद ही अपने! 
उन, एक क्षण के, 
अनुभवों से, 
स्मृति के
रुकते.... नहीं यह ! 
अरे... रे! 
प्रारंभ में कितने प्रियल! 
कितने सुखद.. रे!  

आनंद ही लगते हैं, 
मुझको
पर, 
एक पल, 
बस एक पल! 
जीवन.. है इनका!  

क्या इसलिए? 
मैं दुखी.. हूँ, 
चाहता हूँ!  
अनवरत मैं धार इसकी 
इस चाह में..
पीछे लगा हूं आज तक! 

जानता हूँ! कुछ नहीं 
यह!  
सत्य तो है ही नहीं! 
एक धागा 
मर्म का, 
मन, हृदय, मस्तिष्क का
जाने कहा से 
है जुड़ा
इसे क्या कहूं! 
इसे क्या कहूं। 

मैं  नहीं यह, अनुभव नहीं यह! 
कुछ और हूँ, कुछ और हूं मैं।
मैं कौन हूँ 
या जुड़ा हूं, वीर्य रूपी संतति से
जो रस प्रकृति का
मुझमें था
पाला हुआ, मेरे ही श्रम से
मेरे ही घर में
मुझे बांधता है, बंधनों में।

अरे मैं तो मुक्त था 
क्यों बंध गया हूं, बंधनों में।
एक मथनी 
मथ रही संसार को
धूसर किए है, 
धूमिल प्रिए 
यह कामना, है,
आग है,,
रसों का अवपात है।

प्रतिक्रिया, उत्तेजना है 
तात्कालिक
घेरती है एक क्षण में 
ये... हमे।

यही तो संसार है।
कोई रुके तो, 
एक पॉज ले तो,
चाहता हूँ,
ऊपर नहीं, बाहर नहीं
भीतर तो देखे! 
आगे बढ़े यह ठीक है, 
आत्म अवलोकन तो कर ले, 
घाटा मुनाफा सोच ले।

बुद्धि को बोध से, 
योग प्रिय! होने तो दे.
सत्य को उगने तो दे.
इसलिए आओ चलो 
उत्तेजना को छीलते है,,
गर्भ इसका देखते हैं।

मस्तिष्क अपना खोलते हैं 
क्रिया का क्रम 
किस बिना पर टिका है
उस टेक को मस्तिष्क से 
हटाकर
सत्य को पुनि देखते हैं।

आवेग को हम छोड़ते है,
बुद्धि को बोध से 
हम जोड़ते है
बंधनों को खोलते हैं।
बंधनों को खोलते हैं।

जय प्रकाश मिश्र


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