एक भांवर, डालता हूं, भंवर में..

मित्रों, जीवन आश्वासन का खेल! सुनहरे कल की दौड़! एक मृगमरीचिका का पीछा है। आज को छोड़ कल के लिए प्रयत्न यही है जीवन और अंत में क्या? इसी पर यह लाइनें आप खुश हों चाहना है।

एक भांवर, डालता हूं, भंवर में..

जब तक, प्रिये, मैं...

सोचता.. हूं

दूसरी.. 

अब..

शुरू कर.. दूं, 

पूंछ... ही, मिलती... नहीं, 

मैं, क्या करूं!


भंवर... 

हो जाता है गायब, 

शून्य... में, 

मिलता... नहीं अब।

दूसरा... है, 

उभरता, 

उससे.. भी, सुंदर! 

खींचता

पर..है, अलग!

कुछ.., और प्यारा और गह्वर..

मरीचिका यह!  

इंद्रधनुषी रंग लेकर.. ।


खुश.. हुआ 

मैं.., दौड़ता.. हूं!

फिर वहीं मैं, पहुंचता हूं,

पहले जहां 

था,

क्या है, ये.. सब...

बता.. न! 

आज तक, आया नहीं 

चाहा हुआ कल" 

चाह 

जिसकी, 

बे-सबब ले, उम्र घूमा, हर जगह! 

 

एक आह! लेकर, छोड़ आया,

जिंदगी के सुनहरे पल, 

सच.. है ये, 

वे....

जिंदगी के, सुनहरे... पल।


उलझा हुआ, मैं.. इसी में

बस इसी में,

कल 

आएगा, मेरे हाथ में

मधुमास होगा, साथ में

जिंदगी का, अर्थ होगा, 

अर्थ का सौभाग्य होगा।

मरीचिका का अंत होगा

कल मेरे, इस हाथ होगा।

आ गया मैं इस, 

भंवर,।।।

एक भांवर, डालता हूं, भंवर में..

जब तक, प्रिये, मैं...

सोचता.. हूं

दूसरी.. 

अब..

शुरू कर.. दूं, 

पूंछ... ही, मिलती... नहीं, 

मैं, क्या करूं!


यह, ना.., हुआ तो

ना... हुआ.

एक..

एक समिधा, 

यज्ञ में, 

इस लपलपाती अग्नि में

जब... डालता हूँ, 

लपकती.. है

स्नेह को 

यह

खोजती है, स्वार्थ को

यह ढूंढती है।


प्रेम से यह दूर है, अब

हाय! कैसी जीभ 

लेकर.. 

देखती.. है,

डर.. गया हूं! 

सच कह रहा हूँ, 

जिंदगी की चाल से!

जिंदगी के खेल से!

सब, समझ कर, 

मरीचिका को छोड़कर

अब आज में, 

मैं जी रहा हूँ।

वर्तमान की इस गोद में 

मैं, जी रहा हूं।

जय प्रकाश मिश्र


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